अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
उमो उवाच
एताभिः सह संमन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
एताभिरनवद्याभिर्मय़ा चैवाल्पमेधय़ा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
एताभिर्धार्यते लोकस्ताभ्यः शास्त्रं विनिःसृतम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
एताभिश्चाप्यृते यज्ञो न प्रवर्तेत्कथञ्चन ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
एताभ्यां तु परो यस्य चेतनावानिति स्मृतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
ऋतुपर्ण उवाच
एताभ्यां रंस्यसे सार्धं वस वै मय़ि वाहुक ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एतामक्षौहिणीं प्राहुः सङ्ख्यातत्त्वविदो जनाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्तीपुत्रस्य सूतके |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
एतामद्य परामृश्य स्त्रिय़ं राक्षस मानुषीम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
गरुड उवाच
एतामपि निषादीं त्वं परिगृह्याशु निष्पत |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
एतामवस्थां प्राप्यैके मरणं वव्रिरे जनाः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
एतामवस्थां सम्प्राप्तं तन्ममाचक्ष्व कौरव ||
९३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
एतामहिंसां यज्ञेषु व्रूय़ास्त्वं सततं प्रभो ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
एतामाश्रित्य निःश्रेणीं व्रह्मलोके महीय़ते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
एतामास्थाय़ शाखां त्वं खादेमौ गजकच्छपौ ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
गौतम उवाच
एतामृते हि नान्या वै त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
जनमेजय़ उवाच
एतामेव कथां दिव्यामा प्रजापतितो मनोः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
एतामेवाहमादाय़ गमिष्यामि स्वमालय़म् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
एतावच्छक्यमस्माभिर्वक्तुं द्रष्टासि जानकीम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
एतावच्छ्रेय़ इत्याह प्रह्रादो व्रह्मवादिनम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
एतावच्छ्रेय़ इत्येव वृहस्पतिरभाषत |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
एतावता ये पुरुषं त्यजन्ति; तेषां सख्यमन्तवद्व्रूहि राजन् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
एतावतापि लाभेन तोष्टुमर्हसि काश्यप |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
एतावतिक्रम्य कथं नृपत्वं; दुर्योधन प्रार्थय़सेऽद्य मोहात् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
एतावत्पाण्डवानां हि नास्ति किञ्चिदिह स्वकम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
एतावदनुपश्यन्तो यतय़ो यान्ति मार्गगाः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
व्यास उवाच
एतावदहमप्येनं कुर्यामिति तदाव्रवीत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदिह शक्तस्त्वं रूपं द्रष्टुं ममानघ ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रुषा गाण्डीवभृत्तदा |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा तं द्रोणः शरव्रातैरवाकिरत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा देवर्षिर्विरराम स नारदः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा द्रुपदात्मजा सा; शैव्यात्मजं चन्द्रमुखी प्रतीता |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यमश्वान्धनानि च |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्य; दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय़ राजन् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा नृपतिः पुत्रो दुर्योधनस्तव |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा प्रय़युर्हि शीघ्रं; तान्येव वर्त्मान्यनुवर्तमानाः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा प्रय़यौ परिदाय़ युधिष्ठिरम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा भीमं तु विसृज्य च महामनाः |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा भीमस्तु हर्षेण महता युतः |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा यन्तारं व्रह्माणं परिवर्जय़न् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा राजा तु स सर्वान्पृथिवीपतीन् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा राजानं भगदत्तमथाव्रवीत् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं कर्मारपरिमार्जितम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं केशवः परवीरहा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तरधीय़त ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् |
३६ क