chevron_left  एकतोarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
एकतो वा जगत्कृत्स्नमेकतो वा जनार्दनः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
एकतो ह्यस्य दाराश्च ज्ञातय़श्च सवान्धवाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
एकत्र चिरवासो हि क्षमो न च मतो मम |
८ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
एकत्र भुज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
एकत्रिंशत्तव सुता भीमसेनेन पातिताः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
एकत्रिंशन्महाराज पुत्रांस्तव महारथान् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
एकत्वं च वहुत्वं च प्रकृतेरनु तत्त्ववान् |
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
एकत्वं दर्शनं चास्य नानात्वं चाप्यदर्शनम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
एकत्वं प्रलय़े चास्य वहुत्वं च प्रवर्तनात् ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
एकत्वं प्रलय़े चास्य वहुत्वं च यदासृजत् |
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
एकत्वं वुद्धिमनसोरिन्द्रिय़ाणां च सर्वशः |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
एकत्वं वै भवत्यस्य यदा वुद्ध्या न वुध्यते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
एकत्वमक्षरं प्राहुर्नानात्वं क्षरमुच्यते ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परन्तपः ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
एकत्वमुपसम्पन्नो न त्वासेय़ं त्वय़ा सह ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
स्यूमरश्मिरु उवाच
एकत्वे च पृथक्त्वे च विशेषो नान्य उच्यते |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
एकत्वेन पृथक्त्वेन वहुधा विश्वतोमुखम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
एकदा स्माल्पकं भुङ्क्ते न वैति च पुनर्गृहान् ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
एकदेशक्रिय़श्चात्र निरय़ं स निगच्छति ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वराङ्गने |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
एकदोषा हि वहवो मृद्नीय़ुरपि कण्टकान् |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
एकद्वारामनादेय़ां सूपतीर्थामकर्दमाम् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
एकधा च द्विधा चैव चतुर्धा च महावलम् |
८७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
एकधा च द्विधा चैव वहुधा च स एव च |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
एकधा वहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
एकनिश्चय़कार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीय़ते ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
एकपक्षाक्षिचरणः शकुनिः खचरो निशि |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
एकपक्षाक्षिचरणा वर्तिका घोरदर्शना |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
एकपत्न्या यदुक्तोऽसि गच्छ त्वं मिथिलामिति |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
एकपत्राधिकं पत्रं फलमेकं च वाहुक ||
९ ग
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
एकपर्वतके नद्यः क्रमेणैत्य व्रजन्ति ते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
एकपाणेन भद्रं ते नलेन स पराजितः |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
एकपाणेन भद्रं ते प्राणय़ोश्च पणावहे ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम् |
१२६ क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
एकपादस्थितश्चासीत्षण्मासाननिलाशनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
एकपादस्थितस्तीव्रं चचार सुमहत्तपः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
एकपादस्थिताः सम्यक्काष्ठभूताः समाहिताः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एकपादस्थिताः सम्यक्काष्ठभूताः समाहिताः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
देवा ऊचुः
एकपादस्थिते धर्मे यत्रक्वचनगामिनि |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
एकपादस्थितो देव ऊर्ध्ववाहुरुदङ्मुखः |
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ||
७६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
एकपादांश्च पुरुषान्केवलान्वनवासिनः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्ववाहुरतन्द्रितः |
६ क