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वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
मित्रविन्दाय़ वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
मित्रवुद्ध्या च गोमाय़ुं सान्त्वय़ित्वा प्रवेश्य च |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
मित्रव्रह्मगुरुद्वेषी जाल्मकः सुविगर्हितः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
मित्रश्च क्षुरपर्यन्तं चक्रं गृह्य व्यतिष्ठत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
मित्रश्च वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
मित्रसम्वन्धिनश्चापि सन्त्यक्ष्यन्ति नरास्तदा |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
युधिष्ठिर उवाच
मित्रसौहृदभावेन उपदेशं करोति यः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
मित्राणां चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रिय़ः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
मित्राणां सुहृदां चैव वान्धवानां तथैव च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
मित्राणि च न वर्धन्ते तथामित्रीभवन्त्यपि ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
मित्राणि चैनमतिरागाद्भजन्ते; देवा इवेन्द्रमनुजीवन्ति चैनम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां च हीय़ते ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
मित्राणि ते प्रहृष्यन्तु व्यथन्तु रिपवस्तथा |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च वलावलम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तय़न्तीह यैर्वुधाः ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
मित्रात्प्रभवते सत्यं मित्रात्प्रभवते वलम् |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
मित्रामात्यं पुरं राष्ट्रं दण्डः कोशो महीपतिः |
१५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
मित्रामात्यैः सुसम्पन्नः सम्पन्नो योज्ययोजकैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
मित्रार्थमभिसन्तप्तो भक्त्या सर्वात्मना गतः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
मित्रार्थे तौ पराक्रान्तौ स्पर्धिनौ शुष्मिणौ रणे |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
मित्रार्थे योजय़त्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
मित्रावरुणय़ोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
मित्रावरुणय़ोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
मित्रावरुणय़ोर्लोकानादित्यानां तथैव च |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
मित्रावरुणय़ोर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ||
११६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः ||
१३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
मित्रेणाभ्यर्थितं मित्रमर्थे संशय़िते क्वचित् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
मित्रेषु चानभिद्रोहः सर्वं तेष्वभवत्प्रभो ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्विधेषु विशेषतः ||
१७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
युधिष्ठिर उवाच
मित्रेष्वमित्रेष्वपि च कथं भावो विभाव्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
मित्रेष्वमित्रेष्वैश्वर्ये चिरं यशसि तिष्ठति ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
मित्रैः प्रहीय़माणस्य वह्वमित्रस्य का गतिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
मित्रैः सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसावृतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
मित्रैरर्थकृती नित्यमिच्छत्यर्थपरश्च यः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मित्रोपभोगसमय़े किं त्वं नैवोपसर्पसि ||
१२० ख
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
मिथः कृत्यं च तस्मै स आदाय़ वहु गच्छतु |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
मिथः संय़ुध्यमानानां वृष्णिवीरेण धीमता ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
मिथः सङ्कथय़ां चक्रुर्नेशोऽस्ति कुलपांसनः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
मिथः सङ्गम्य सहिताः पाण्डवान्प्रति मानिनः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
मिथःकृतोऽपनिधनः परस्वहरणे रतः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
मिथश्च समभाषेतामभीतौ भय़वर्धनौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय १९७
स्त्र्यु उवाच
मिथिलाय़ां वसन्व्याधः स ते धर्मान्प्रवक्ष्यति |
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
मार्कण्डेय़ उवाच
मिथिलाय़ां वसन्व्याधः स ते धर्मान्प्रवक्ष्यति ||
३ ख