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आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
एतां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा देव कृतां शुभाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
एतां यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
एतां राजोपनिषदं यय़ातिः स्माह नाहुषः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
एतां रौक्मीं नागकक्ष्यां च जैत्रीं; जैत्रं च मे ध्वजमिन्दीवराभम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
एतां वुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
एतां वुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
एतां वुद्धिं विनिश्चित्य ममत्वं वर्जितं मय़ा |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ कर्शितौ वां मय़ा क्षुधा ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ गुप्तचित्तश्चरेद्वुधः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ जीवितव्यं सदा भवेत् |
९३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ दिवसानेकविंशतिम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ मङ्किर्निर्वेदमागतः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
एतां वुद्धिं समास्थाय़ विश्वामित्रो महामुनिः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
एतां वुद्धिमहं प्राप्य न प्रहृष्ये न च व्यथे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
एतां वुद्ध्वा नरः सर्वां भूतानामागतिं गतिम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
एतां वुद्ध्वा नरो वुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
पृथिव्यु उवाच
एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रय़तो व्राह्मणर्षभान् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एतांश्चान्यांश्च रुचिरान्व्रह्मणेऽमिततेजसे |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
एतांश्चान्यांश्च सुवहून्नानाजनपदेश्वरान् |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
एतांश्चान्यांश्च सुवहून्मदीय़ांश्च सहस्रशः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
एतांश्चापि निरोत्स्यामि वेलेव मकरालय़म् ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
एतांस्तु धर्मान्गार्हस्थान्यः कुर्यादनसूय़कः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
एतांस्तु वासुदेवोऽपि रथोदारान्प्रशंसति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
एतांस्त्वं वचसा साम्ना समाश्वासय़ मानद |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
एताः कुरूणामृषभो महात्मा; श्रुत्वा गिरो व्राह्मणसत्तमस्य |
११४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
एताः कृत्याश्च कार्याश्च कृताश्च भरतर्षभ |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
एताः पवित्राः पुण्याश्च त्रिषु लोकेष्वनुत्तमाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
एताः पुरा अददन्नित्यमेव; शान्तात्मानो दानपथे निविष्टाः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
एताः प्रकृतय़स्त्वष्टौ विकारानपि मे शृणु |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
एताः प्रकृतय़स्त्वष्टौ विकाराश्चापि षोडश |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
एताः शिवा घोरनादा दिशं दक्षिणपश्चिमाम् |
७४ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
एताः सहस्रशश्चान्या नृत्तगीतविशारदाः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
एताः सुसूक्ष्मवसना मद्रराजं नरर्षभम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
एताञ्जित्वा महावीर्यान्कर्णः शत्रुगणान्वहून् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
एताञ्शोकभय़ोत्सेकान्मोहनान्सुखदुःखय़ोः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रिय़राघवः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
एतादृशः केशवोऽय़ं स्वय़म्भू; र्नाराय़णः परमश्चाव्ययश्च |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
एतादृशानि दुःखानि सहन्ते दुर्वलीय़साम् |
१०६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
एतादृशौ फल्गुनवासुदेवौ; कोऽन्यः प्रतीय़ान्मदृते नु शल्य ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
एतानजित्वा सगणान्नैव प्राप्यो जय़द्रथः ||
२८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
एतानद्य हनिष्यामि पश्यतस्ते न संशय़ः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
एतानन्यांश्च विविधान्गन्धमादनसानुषु ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
एतानन्यांश्च सुवहून्समीपस्थान्महारथान् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
एतानर्हानभिगतानाहुः संवत्सरोषितान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
एतानशिष्टान्वुध्यस्व नित्यं लोभसमन्वितान् ||
१९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
एतानहत्वा न मय़ा तु शक्य; मितोऽपय़ातुं रिपुसङ्घगोष्ठात् ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
एतानासाद्य संसारान्कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते ||
६९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीय़ते |
१८ क