chevron_left  एषाarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
एषा सा यमुना राजन्राजर्षिगणसेविता |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
एषा हि तपसा स्वेन संय़ुक्ता व्रह्मवादिनी |
८२ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
भीम उवाच
एषा ह्यनर्हती वाला पाण्डवान्प्राप्य कौरवैः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
एषां कार्यगरीय़स्त्वाद्दृश्यते गुरुलाघवम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
एषां गुणान्पृथक्त्वेन निवोध गदतो मम ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो वुधैः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
एषां देवनिकाय़ानां पृथक्पृथगनेकशः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
एषां द्वैधं समुत्पन्नं योधानां युधि भारत |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
एषां पृथक्समस्तानां श्रूय़ते मधुरः स्वरः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
एषां मांसानि संस्कृत्य मानुषाणां यथेष्टतः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
एषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पञ्चसु |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे; न त्वां तपेत्कालविपर्ययोऽय़म् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
एषां सुराणां तनय़ाः कथं नु; वने चरन्त्यल्पसुखाः सुखार्हाः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
एषां ह्येकैकशो राज्ञां समर्थः पाण्डवान्प्रति |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
एषान्या त्वनवद्याङ्गी करसंमितमध्यमा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १६९
मातलिरु उवाच
एषामन्तकरः प्राप्तस्तत्त्वय़ा च कृतं तथा ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
एषामन्ये पङ्क्तिदूषास्तथान्ये पङ्क्तिपावनाः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
एषामेकैकशो राजन्नर्घ्यमानीय़तामिति |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
एषामेकैकशोऽर्थानां सौक्ष्म्यादीनां सुलक्षणम् |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
एषामेव कृतो भागो नवधा पृतनापते ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
एषितव्यं सदा वाचा नृपेण द्विजसत्तमात् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
व्राह्मण उवाच
एषितस्यात्मनः काले वृद्धस्येव सुतो यथा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
एषैकतोऽपि विभ्रष्टा न भवत्यरिसूदन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
एषैव खलु मर्यादा यामय़ं परिवर्जय़ेत् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
एषैव ते वुद्धिरस्तु व्राह्मणान्प्रति केशव |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
एषैव तेऽस्तूपमा जीवलोके; यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
एषैव निष्ठा सर्वस्य यद्यदस्ति च नास्ति च |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
एषोऽक्षकुशलो जिह्मो द्यूतकृत्कितवः शठः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
एषोऽप्ययस्ते राजेन्द्र यथावत्परिभाषितः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
एषोऽर्जुनो नात्र विचार्यमस्ति; यद्यस्मि सङ्कर्षण वासुदेवः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
एषोऽर्जुनो रणे भीष्मं प्रय़ाति कुरुनन्दनः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
एषोऽर्जुनो रणे यत्तो युध्यते कुरुभिः सह |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
एषोऽस्माकं कुलस्तम्व आसीत्स्वकुलवर्धनः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
एषोऽस्य पुत्रोऽभिमतः पुष्करः पुष्करेक्षणः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
एषोऽस्य हन्मि सङ्कल्पं शिक्षय़ा च वलेन च ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एषोऽहं व्यक्तिमागम्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
एषोऽऽश्रमपदस्तात व्रह्मचारिण इष्यते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
एष्टव्या वहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गय़ां व्रजेत् |
८५ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
एष्टव्या वहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गय़ां व्रजेत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
एष्टव्या वहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गय़ां व्रजेत् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
एष्टव्याः शतशस्त्वन्ये चरन्ति मम वाजिनः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्त्वा द्वारकां यय़ौ ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
एष्यतीह महावाहुर्वशी शौरिरुदारधीः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
एष्वर्थेषूत्तरं तस्मात्प्रवेद्यं सत्समागमे ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
एहि कर्ण मय़ा सार्धं प्रतिपद्यस्व सङ्गरम् |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ५९
दुर्योधन उवाच
एहि क्षत्तर्द्रौपदीमानय़स्व; प्रिय़ां भार्यां संमतां पाण्डवानाम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
एहि गच्छ प्रहितो जातवेदो; वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |
८ क