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शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
एते राष्ट्रे हि तिष्ठन्तो वाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
एते रुक्मरथा नाम राजपुत्रा महारथाः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
एते लोकाः पुण्यकृतामन्नदानां महात्मनाम् |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
एते वहुत्वात्त्वरिताः पुनर्गच्छन्ति पाण्डवम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
एते वहुविधाः शैलं शोभय़न्ति महाप्रभाः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
एते वा मामहं वैनाननुजानीहि पार्थिव ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
एते वालान्मृत्यवे प्रापय़न्ति; धीरास्तु धैर्येण तरन्ति मृत्युम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
एते वासुकिजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
एते विनिर्जिताः सर्वे सङ्ग्रामे सव्यसाचिना |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
एते विप्रवराः सर्वे प्रजानां पतय़स्त्रय़ः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
एते विश्वकृतो विप्रा जाय़न्ते ह पुनः पुनः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
एते विय़ति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २५४
द्रौपद्यु उवाच
एते वीराः पतय़ो मे समेता; न वः शेषः कश्चिदिहास्ति युद्धे ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
एते वेत्स्यन्ति विक्रान्तास्त्वदर्थं लक्ष्यमुत्तमम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
एते वै निरय़ास्तात स्थानस्य परमात्मनः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
एते वै पर्वता राजन्सिद्धचारणसेविताः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
एते वै पशवो राजन्ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
एते वै वलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
एते वै साधवो दृष्टा व्राह्मणा धर्मभिक्षवः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
एते वैडूर्यवर्णाभं क्षोभय़न्ति महत्सरः ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
एते वैश्यसमा राजन्व्राह्मणानां भवन्त्युत ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
वसिष्ठ उवाच
एते व्रह्मर्षय़श्चैव वृहस्पतिपुरोगमाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
एते व्रह्मर्षय़ो नित्यमाश्रिता दक्षिणां दिशम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
एते व्रह्मसमा राजन्व्राह्मणाः परिकीर्तिताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
एते व्राह्मणचण्डाला महापथिकपञ्चमाः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
एते वय़ं हनिष्यामः पाण्डवान्समरे त्रय़ः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
तुलाधार उवाच
एते शकुन्ता वहवः समन्ताद्विचरन्ति हि |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
एते शव्दा भृशं तीव्राः प्रवृत्ताः कुरुसागरे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
एते शिष्यगुणाः सर्वे विज्ञातव्या यथार्थतः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
एते शूद्रसमा राजन्व्राह्मणानां भवन्त्युत ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
एते शेषा महाराज सर्वेऽन्ये निधनं गताः ||
३५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
एते सप्त महेष्वासा द्रोणपुत्रपुरोगमाः |
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
एते समरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशय़ः ||
४५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
एते समेत्य सहिता भ्रातृव्यसनकर्शिताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एते सर्वशरीरेषु तिष्ठन्ति विचरन्ति च ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
एते सर्वे गजान्हत्वा उपय़ान्ति स्म पाण्डवाः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
एते सर्वे यद्वदन्ते तदस्तु; आय़ुष्मन्तः कुरवः सन्तु सर्वे ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
एते सर्वे वरुणस्योत यज्ञं; द्रष्टुं गता इह आय़ान्ति भूय़ः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
एते सर्वे शूद्रसमा भवन्ति; राजन्नेतान्वर्जय़ेद्देवकृत्ये ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
एते सर्वे शोच्यतां यान्ति राज; न्यश्चाय़ुक्तः स्नेहहीनः प्रजासु ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
एते सर्वे षण्ढतिला विनष्टाः; क्षय़ं गता नरकं दीर्घकालम् ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
एते सानुचराः सर्वे दिव्यरूपाः स्वलङ्कृताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
एते सुकृतिनः पार्थ स्वेषु धिष्ण्येष्ववस्थिताः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
एते सुय़ोधनस्यार्थे संरव्धाः कुरुभिः सह |
२० क