अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
एतेषु दत्तमक्षय़्यमेते वै पङ्क्तिपावनाः ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
एतेषु देवगन्धर्वाः प्रजाश्च जगतीश्वर |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येषु चाभितः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
एतेषु निहतेष्वद्य ये त्वय़ा परिकीर्तिताः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
एतेषु योगाः सेनाय़ाः प्रशस्ताः परवाधने ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय
४४
दुर्योधन उवाच
एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
एतेषु विहितो धर्मो व्राह्मणस्य युधिष्ठिर ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
एतेषु सर्वेषु समागतेषु; पौरेषु वृद्धेषु च सङ्गतेषु |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतेषु हि नरः सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
एतेषु हि नरव्याघ्र जीवत्सु न कथञ्चन |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
एतेष्वपि हि जातेषु फलजातानि मे शृणु |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
एतेष्वाधाय़ तद्द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डवः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
एतेष्वाप्तान्प्रतिष्ठाप्य राजा भुङ्क्ते महीं चिरम् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
एतेष्वावर्जितैरश्वैः काम्वोजैर्यवनैः शकैः |
१०८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
एतेष्वेव त्विमे लोकाः कृत्स्ना इति निवोध तान् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकय़ात्रा प्रतिष्ठिता |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
एतेष्वैश्वर्यमाधाय़ भूतिमिच्छसि भारत ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
एतेऽन्ये मण्डलीभूताः पावकेनेव कुञ्जराः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
एतेऽपि यस्योद्विजन्ते प्रभावा; त्कस्मात्तस्मान्मादृशी नोद्विजेत ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
एतेऽपि सदृशं वर्णं जनय़न्ति स्वय़ोनिषु |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
एतेऽप्येवं भवितारः पुरस्ता; त्तस्मादेतां दरिमाविश्य शेध्वम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
एतेऽभवन्नर्जुनतः क्षुद्रसर्पास्तु कर्णतः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
एतेऽर्जुनस्य वैराटे शराः सर्पविषोपमाः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
एतेऽष्टावग्निजाः सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामय़ाः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीय़ते |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजातिकुलोद्भवः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
एतैः शव्दैर्गम्यते वुद्धिनेत्रै; स्तस्मै नमो व्रह्मणे व्राह्मणाय़ ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
एतैः समेत्य कर्तव्यं प्राय़श्चित्तमिति श्रुतिः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
एतैः सर्वैः समाय़ुक्तः पुमानित्यभिधीय़ते |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
एतैः सहाय़ैरुपय़ाति राजा; मरुद्गणैरिन्द्र इवाभिगुप्तः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
एतैरतिरथैर्गुप्तः पञ्चभिर्भरतर्षभ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
एतैरपि महाय़ज्ञैरिष्टं ते भूरिदक्षिणैः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
एतैरुपाय़ैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुय़ात् ||
५९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
एतैरेव गुणैर्युक्तः प्रतीहारोऽस्य रक्षिता |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
एतैरेव शरैश्चाहं दग्धव्योऽन्ते नराधिपाः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
एतैर्गुणैर्हीनतमे न देय़; मेतत्परं व्रह्म विशुद्धमाहुः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
एतैर्जितैस्तु जय़ति सर्वाँल्लोकान्न संशय़ः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
एतैर्दोषैर्नरो राजन्क्षय़ं याति न संशय़ः |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
एतैर्नरगजाश्वानां प्रासशक्तिपरश्वधैः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
एतैर्निदर्शनैर्व्रह्मन्नावसीदामि सत्तम ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
एतैर्लोकाः सुसंरुद्धा देवानां मानुषाद्भय़म् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
एतैर्वर्धय़ते तेजः पाप्मानं चापकर्षति ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
एतैर्विद्धाः सर्व एव मरणं यान्ति मानवाः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय़ तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
एतैर्विमुक्तो दोषैर्यः स दमः सद्भिरुच्यते ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
एतैर्विमोहय़त्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||
४० ख