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उद्योग पर्व
अध्याय ११७
गालव उवाच
भवतो ह्यनृणो भूत्वा तपः कुर्यां यथासुखम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपचीय़ते |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
भवतोऽनुनय़ाम्येवं पूरू राज्येऽभिषिच्यताम् ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भवतोऽनुविधानेन राज्यं नः पश्यतां हृतम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
भवतोऽर्थकृदित्येव मय़ि दोषो हि तैः कृतः |
५३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
भवत्कृतमिमं स्नेहं युधिष्ठिरविवर्धितम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
भवत्तपोविघातो वा येन स्याद्विरमे ततः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्प्रतीक्षः कृष्णोऽसौ धर्मराज महाद्युते |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
भवत्प्रसादादस्माभिः समित्रैः सहवान्धवैः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं चर्तुं द्विजर्षभ |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
भवत्प्रसादादिच्छामि प्रवेष्टुं दुर्भिदां चमूम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्प्रसादाद्धि वय़ं प्राप्नुय़ाम फलं शुभम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्प्रसादाद्भगवंस्त्रिलोकगतिविक्रम |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्प्रसादाद्भगवन्यदिदं रत्नमाहृतम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
कच उवाच
भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः; स्मरे च सर्वं यच्च यथा च वृत्तम् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
भवत्प्रसादान्न भय़ं किञ्चित्तस्य भविष्यति ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
भवत्यगदसङ्काशो विषय़े तस्य भारत ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
ऋषय़ ऊचुः
भवत्यग्निश्च वाय़ुश्च पृथिव्यापश्च कारणैः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
भवत्यग्निस्तथादित्यो मृत्युर्वैश्रवणो यमः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
भवत्यतिवले ह्येतज्ज्ञानमप्युपघातकम् ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
भवत्यथ मुहूर्तेन चण्डालसमदर्शनः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
भवत्यनपगान्सर्वांस्तान्गुणाँल्लक्षय़ामहे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
भवत्यनपगान्सर्वांस्तान्गुणाँल्लक्षय़ाम्यहम् ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
भवत्यनित्यप्रज्ञत्वात्सा तस्यैव न रोचते ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यनुमते कच्चिदय़ं कर्तुमिहेच्छति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
भवत्यभक्षय़न्मांसं दय़ावान्प्राणिनामिह ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
भवत्यभ्यधिकं भीष्मो लोकेष्ववमतः सताम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
भवत्यमुत्र चाक्षय़्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
भवत्यरोगो द्युतिमान्वलरूपगुणान्वितः ||
१२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यरोगो द्युतिमान्वलरूपसमन्वितः |
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्वणम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
भवत्यवस्थिते यत्ते पाण्डवा गतचेतसः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यविजिता केन हेतुनैषा मता तव ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्नुते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्या गूढमन्त्रत्वात्पीडितोऽस्मीत्युवाच ताम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
युधिष्ठिर उवाच
भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम् |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्या विदितं सर्वमुक्तवान्यत्सुतस्तव ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यां वद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
ऋषय़ ऊचुः
भवत्याः संमते सर्वे गृह्णीमहि विसान्युत ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भवत्युपाध्याय़ेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुम् |
९९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
भवत्येकः कुले विप्रः शिष्टान्ये कामचारिणः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
भवत्येको ह्ययं नित्यं शरीरे सुखदुःखभाक् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्येव हि मे वुद्धिर्दृष्ट्वात्मानं सुखाच्च्युतम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
भवत्येव हि मे सूत वुद्धिर्दोषानुदर्शिनी |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
भवत्येवं समुदय़ात्कलानामपि जन्तवः ||
१२५ ख