स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
एनं च त्वं विजानीहि भ्रातरं पूर्वजं पितुः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एनं दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किङ्करा यथा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
एनं पर्वतराजानमारुह्य पुरुषर्षभ |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
एनं प्राप्य दुरात्मानं क्षय़ं क्षत्रं गमिष्यति ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
एनं रक्षत राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् |
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
एनं राजानं शुश्रूषस्वेति ||
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
द्रौणिरु उवाच
एनं सेनापतिं कृत्वा नृपतिं नृपसत्तम |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
एनं हत्वा निहन्तासि पुनः संशप्तकानिति |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
एनं हत्वा शितैर्वाणैः कृतकृत्यो भविष्यसि ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
एनं हि स्वरसम्पन्ना वहवः सूतमागधाः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एनमष्टशताः सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
एनमाश्रित्य पुत्रस्ते मन्दवुद्धिः सुय़ोधनः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
एनमासाद्य राजानः समृद्धवलवाहनाः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
भीमसेन उवाच
एनमेव समारुज्य द्रावय़िष्यामि शात्रवान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
एनसा च न योगं त्वं प्राप्स्यसे जातु मानद |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
एनसा तेन नान्यं स उपाशङ्कितुमर्हति ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
एनसा न स दैवं वा कालं वा गन्तुमर्हति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
एनसा युज्यते राजा दुर्दान्त इति चोच्यते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
एनसो मोक्षमाप्नोति सा च तौ चैव धर्मतः ||
६५ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एनां प्रविश्योपाध्याय़िनीं पृच्छ किमुपहरामीति |
९८ घ
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
एभिः कालाष्टमैर्भावैर्यः सर्वैः सर्वमन्वितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
एभिः परिवृतो व्यासः शिष्यैः पञ्चभिरुत्तमैः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
एभिः पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकाङ्क्षसि |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
एभिः शिष्यैः परिवृतो व्यास आस्ते महातपाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
एभिः स सहितस्तत्र यय़ौ देवो यथासुखम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
एभिः समन्वितो राजन्गुणैर्विद्वान्वृहस्पतिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एभिः सम्यक्प्रय़ुक्तैर्हि प्रीय़न्ते देवताः क्षितौ ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
एभिः सह महाराज तीर्थान्येतान्यनुव्रज ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
एभिः सहाय़ैः कस्मात्त्वं विषीदसि परन्तप ||
६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
एभिरेव तु विज्ञातैर्मदः सद्यः प्रणश्यति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
एभिर्द्रव्यैरहं हीनो योद्धुमिच्छामि पाण्डवम् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
एभिर्मय़ा निहन्तव्या दुर्विनीताः सुरारय़ः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
एभिर्विशेषैः परिशुद्धसत्त्वः; कस्मान्न पश्येय़मनन्तमीशम् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
एभिस्तदा मय़ा वीर सङ्ग्रामे तारकामय़े |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
एभ्यः प्रवर्तते दुःखमेभ्यः पापं प्रवर्तते |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
एभ्यो निकृतिपापेभ्यः प्रमुञ्चात्मानमात्मना |
३२ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
एरकाणां तदा मुष्टिं कोपाज्जग्राह केशवः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एरकारूपिभिर्वज्रैर्निजघ्नुरितरेतरम् ||
२२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
एलापत्रस्य तु वचः श्रुत्वा नागा द्विजोत्तम |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिणः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
एवं कथय़तां तेषां जय़माशंसतां प्रभो |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
एवं कथय़तामेव तेषां स दिवसो गतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं करिष्यामि यथा त्वय़ोक्तं; प्रज्ञा हि मे भूय़ एवाभिवृद्धा |
११५ क