chevron_left  मण्डलावर्तमार्गेषुarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
मण्डली मेरुधामा च देवदानवदर्पहा |
८८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
मण्डलीकृतमेवास्य धनुः पश्याम मारिष |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
मण्डलीकृतमेवास्य धनुश्चादृश्यताद्भुतम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
मण्डलीकृतमेवास्य नित्यं धनुरदृश्यत |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
मण्डलेनैव धनुषा नृत्यन्पार्थः स्म दृश्यते ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
मण्डलेनैव धनुषा सदा दृश्योऽसि संय़ुगे ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
मण्डूकशाय़ी च तथा वीरासनगतस्तथा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
मण्डूकय़ोगनिय़तैर्यथान्याय़निषेविभिः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
मण्डूकय़ोगशय़नो यथास्थानं यथाविधि |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
मण्डोदरी च तुण्डा च कोटरा मेघवासिनी |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
मण्डय़ां चक्रिरे तद्वै पुरं स्वर्गवदच्युताः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
मण्युत्तमा वज्रसुवर्णमुक्ता; रत्नानि चोच्चावचमङ्गलानि |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
अध्वर्युरु उवाच
मतं मन्तुं क्रतुं कर्तुं नापराधोऽस्ति मे द्विज ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भीष्म उवाच
मतं मम तु कौन्तेय़ तपो नानशनात्परम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
मतङ्ग तप्यसे किं त्वं भोगानुत्सृज्य मानुषान् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थय़न्नतिदुर्लभम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
मतङ्ग परमं स्थानं वार्यमाणो मय़ा सकृत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
शक्र उवाच
मतङ्ग व्राह्मणत्वं ते संवृतं परिपन्थिभिः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
मतङ्ग सम्प्रधार्यैतद्यदहं त्वामचूचुदम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
मतङ्गं याजय़ां चक्रे यत्र प्रीतमनाः स्वय़म् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
मतङ्गः सुसुखं प्रेप्सुः स्थानं सुचरितादपि ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
मतङ्गवाप्यां यः स्नाय़ादेकरात्रेण सिध्यति |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
मतङ्गस्य च संवादं गर्दभ्याश्च युधिष्ठिर ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
मतङ्गस्य यथातत्त्वं तथैवैतद्व्रवीहि मे ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
मतङ्गो नाम नाम्नाभूत्सर्वैः समुदितो गुणैः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
मतमाज्ञाय़ पुत्रस्य धृतराष्ट्रो नराधिपः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
मतमाज्ञाय़ राज्ञश्च भीमसेनेन माधव |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
मतमेतच्च भीष्मस्य न स राज्यं वुभूषति |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
मतमेतत्पितुस्तुभ्यं गान्धार्या विदुरस्य च ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
मतस्त्रैलोक्यराजस्य मातलिर्नाम सारथिः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रेह लोके; न च त्वदन्यो गृहपतिरस्ति यज्ञे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
मतापित्रोश्च ते वृत्तिः कच्चित्पार्थ न सीदति ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मतिं कृत्वा रणे क्रुद्धा वीरा जय़पराजय़े ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
मतिं चक्रे विनाशाय़ धृतराष्ट्रस्य भूपतेः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
मतिं दध्रे विनाशाय़ कर्णस्य भरतर्षभ ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मतिं मतिमतां श्रेष्ठाः सर्वे प्रव्रूत माचिरम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
मतिनारः खलु सरस्वत्यां द्वादशवार्षिकं सत्रमाजहार ||
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः |
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
मतिनारस्ततो राजा विद्वांश्चर्चेपुतोऽभवत् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
मतिमन्तस्तु ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
मतिमाञ्श्रेय़से युक्तः केशवोऽर्जुनमव्रवीत् ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
मतिमान्धृतिमान्धीमान्रहस्यविनिगूहिता ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मतिमान्वेदविद्वाग्मी शत्रुपक्षक्षय़ङ्करः ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
मतिमास्थाय़ सुदृढां तदकापुरुषव्रतम् ||
४० ख