chevron_left  एतद्व्रह्मन्विजानामिarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
एतद्व्रह्मन्विजानामि महत्कृत्वा तपोऽव्ययम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
एतद्व्रह्मवनं नित्यं यस्मिंश्चरति क्षेत्रवित् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
एतद्व्रह्मविदां तात विदितं व्रह्म शाश्वतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
एतद्व्राह्मण ते वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
एतद्व्राह्मणतो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
एतद्व्रूहि पितः सर्वं सुमहान्संशय़ोऽत्र मे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
एतन्नः संशय़ं छिन्धि प्रमाणं नो भवान्मतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
जनमेजय़ उवाच
एतन्नः संशय़ं व्रह्मन्पुराणज्ञानसम्भवम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
एतन्नानात्वमित्युक्तं साङ्ख्यश्रुतिनिदर्शनात् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
एतन्नाराय़णादस्त्रं तत्प्राप्तं मम वन्धुना ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
एतन्नारोचय़द्राजन्कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
एतन्नारोचय़द्वाक्यं कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
११२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
भीष्म उवाच
एतन्निःश्रेय़सकरं ज्ञानानां ते परं मय़ा |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
एतन्निदर्शनं सम्यगसम्यगनुदर्शनम् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्नो भगवान्सर्वं प्रव्रवीतु यथातथम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
ऋषय़ ऊचुः
एतन्नो विस्मय़करं प्रशंस मधुसूदन |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
एतन्मङ्कणकस्यापि चरितं भूरितेजसः |
५० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मण्डलमित्याहुराचार्या नीतिकोविदाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मनसि कर्तव्यं भवद्भिर्वचनं मम ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
एतन्मनसि कर्तव्यं श्रेय़ एवं भविष्यति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
एतन्मनोनुकूलं मे भवानर्हति भाषितुम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
३ ग
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
५ ग
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्महत्प्रेक्षणीय़ं द्रष्टुं गच्छाम केशव ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
एतन्महामते व्याध प्रव्रवीहि यथातथम् ||
५६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसञ्ज्ञितम् |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मां प्रापय़ानीकं यत्र तालो हिरण्मय़ः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
एतन्मांसस्य मांसत्वमतो वुध्यस्व भारत ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
एतन्माद्रीसुतस्यापि सहदेवस्य कार्मुकम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हितम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
एतन्मूल्यमहं मन्ये किं वान्यन्मन्यसे द्विज ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
एतन्मूल्यमहं मन्ये तव धर्मभृतां वर ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
एतन्मे कारणं सर्वं विस्तरेण निवेदय़ ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे तत्त्वतो व्रूहि धर्मं धर्मभृतां वर |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मे तत्त्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मे पृच्छतो व्रूहि कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे भगवन्सर्वं विस्तरेण यथातथम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय २५८
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे भगवन्सर्वं सम्यगाख्यातुमर्हसि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
एतन्मे भगवानाह कापिलेय़ाय़ सम्भवम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
सौदास उवाच
एतन्मे मतमाज्ञाय़ प्रय़च्छ मणिकुण्डले ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे मन्त्रय़ हितं यदि श्रेय़ः प्रपश्यसि ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे संशय़ं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
अर्जुन उवाच
एतन्मे संशय़ं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
जनमेजय़ उवाच
एतन्मे संशय़ं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ||
७ ख