शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मैवं ते वुद्धिरत्राभूद्दृष्टो जीवो मय़ेति च ||
४५ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
मैवं पुत्रीति शोकार्ता पश्य मामपि दुःखिताम् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
मैवं भूः शाम्यतां वैरं मा ते भूद्वुद्धिरीदृशी |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
मैवं भूय़ इति स्नेहात्तदा चैनमुवाच ह ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
मैवं वद महीपाल नैतदेवं कथञ्चन ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
मैवं वोचः प्रजापाल नैष धर्मः सनातनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
मैवं शक्र पुनः कार्षीः शान्तो भवितुमर्हसि |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
मैवं शुचो मा रुद देवय़ानि; न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचेत् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
मैवमत्रे पुनर्व्रूय़ा न ते प्रज्ञा समाहिता |
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीच्चैनं कृष्णः परवलार्दनः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीच्चैनं जोषमास्स्वेति भारत ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीच्चैनं शमय़न्सान्त्वय़न्निव ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
मैवमित्यव्रवीत्कृष्णः शमय़ंस्तस्य तद्वचः |
१८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मैवमित्यव्रवीत्कृष्णस्तीव्रशोकसमन्वितम् ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीत्कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धवम् ||
२० ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीत्तं तु नारदः प्रहसन्निव |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रवीद्व्यासो निगृह्य मुनिसत्तमः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
मैवमित्यव्रुवन्भीमं गर्हय़न्तोऽस्य साहसम् ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
मैवमित्येव शंसन्तो जैगीषव्यं महामुनिम् ||
६४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
मोकाजिनानि दिव्यानि तस्मै ते प्रददुः करम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्तव्यस्तेषु दण्डः स्याज्जीवितं परिरक्षता ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्तुकामां तु तां दृष्ट्वा शरीरं नारदोऽव्रवीत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
मोक्षं प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्वुदम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
अप्सरस ऊचुः
मोक्षं समय़तोऽस्माकं चिन्तय़स्व पितामह ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
आप ऊचुः
मोक्षं समय़तोऽस्माकं सञ्चिन्तय़ितुमर्हसि ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
युधिष्ठिर उवाच
मोक्षः पितामहेनोक्त उपाय़ान्नानुपाय़तः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
करालजनक उवाच
मोक्षकामा वय़ं चापि काङ्क्षामो यदनामय़म् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
मोक्षजैश्च गुणैर्युक्तः पालय़ामास च प्रजाः ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षणे प्रतिघाते च विदुरोऽवहितोऽभवत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
मोक्षदुष्प्रापविषय़ं वडवामुखसागरम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
मोक्षदोषो महानेष प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन् |
७८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्मानुपृच्छसि |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेय़ं भगवन्नहम् ||
५२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षधर्मश्च विस्पष्टः सकलोऽत्र समाहितः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतत्त्वविचक्षणः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मार्थसंय़ुक्तमिदं प्रष्टुं प्रचक्रमे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा वहुविस्तराः ||
१९८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
मोक्षधर्माश्रितः सम्यक्तत्रैवान्तरधीय़त ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिरनिष्ठुरैः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान्प्रव्रवीतु मे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मेषु निय़तो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
मोक्षभावे स्थितश्चापि द्वन्द्वीभूतः परिग्रहे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षमध्यापय़ामास साङ्ख्यज्ञानमनुत्तमम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
मोक्षमेव व्यवस्यामि वन्धो हि व्यसनं महत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
मोक्षमेवानुसञ्चिन्त्य गमनाय़ मनो दधे |
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितवुद्धिना ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
मोक्षश्चोक्तस्त्वय़ा व्रह्मन्निर्वाणं परमं सुखम् ||
५ ग