शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
एतस्य तु महाप्राज्ञ दोषस्य सुमहान्गुणः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राज; ञ्शेषस्याहं परिपश्याम्युपाय़म् |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतस्य त्वं रथं प्राप्य निवर्तेथाः पुनः पुनः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय़ |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतस्य दर्शय़िष्यामि शीघ्रास्त्रं दृढधन्विनः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतस्य दर्शय़िष्यामि शीघ्रास्त्रं विपुलं शरैः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
एतस्य भुजवीर्येण खाण्डवे हव्यवाहनः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
एतस्य योधा राजेन्द्र विचित्रकवचाय़ुधाः |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतस्य रथमास्थाय़ राधेय़स्य दुरात्मनः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
एतस्य रथवंशो हि तिग्मवेगप्रहारिणाम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
एतस्य रथसिंहस्य तवार्थे राजसत्तम |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
एतस्य वहुलाः सेनाः पाञ्चालाश्च प्रभद्रकाः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतस्य वाहान्कुरु सव्यतस्त्व; मेवं हि यातव्यममूढसञ्ज्ञैः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
एतस्य विततस्तात सुदेवस्य वभूव ह |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मय़ा |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
एतस्य शिष्या हि क्षितिं चरन्ति; सर्वर्त्विजः कर्मसु स्वेषु दक्षाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
एतस्य समरं दृष्ट्वा न व्यथास्ति कथञ्चन |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
एतस्य सर्वं सङ्ग्रामे नपरोक्षं भविष्यति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
एतस्य सैन्या दुर्धर्षाः समरेऽप्रतिय़ाय़िनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
एतस्य हि पिता नागश्चिकुरो नाम मातले |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
एतस्य हि महाराज यथा गाण्डीवधन्वनः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
एतस्य हि महावाहो व्रतमेतत्समाहितम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
एतस्य हि शरस्याजौ नावध्योऽस्ति पुमान्क्वचित् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एतस्यानन्त्यमिच्छामि भगवञ्श्रोतुमञ्जसा ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
एतस्यापि च सङ्ख्यानं वेदवेदाङ्गपारगैः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
एतस्यापि निशामाहुस्तृतीय़मिह कुर्वतः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतस्याभिमुखं वीर रथं पररथारुजः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
एतस्यैवं प्रवृद्धस्य सूतपुत्रस्य संय़ुगे |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
एता दिव्याः सप्त गङ्गास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ||
४७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
एता दीर्घमिवोच्छ्वस्य विक्रुश्य च विलप्य च |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ||
२४ ग
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
एता मय़ा दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु पाण्डव |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
एता यथामुख्यमुदाहृता वो; व्राह्मण्यभावादृजुवुद्धिसत्त्वाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
एता वाचः परुषाः सव्यसाची; स्थिरप्रज्ञं श्रावय़ित्वा ततक्ष |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
एता वाचः शुभाः शृण्वन्सुहृदां भरतर्षभ |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
एता वाचः सुवहुशः कर्ण उच्चारय़न्युधि |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
एता विलप्य वहुलं भर्तृशोकेन कर्शिताः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
एता विस्तरशस्तात तव सङ्कीर्तिता दिशः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
एता हि मनुजव्याघ्र तीक्ष्णास्तीक्ष्णपराक्रमाः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
एता हि मय़माय़ाभिर्वञ्चय़न्तीह मानवान् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
एता हि वरदत्ताश्च वरदाश्चैव वासव |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
एताँल्लोकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
एतां तां क्षत्रिय़स्याहुः पुराणां परमां गतिम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पवुद्धय़ः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
एतां दृष्ट्वा श्रिय़ं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
एतां दृष्ट्वा स्त्रिय़ो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रिय़ः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
एतां द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां कवय़ो विदुः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
एतां पुरा विष्णुरिव हत्वा दैतेय़दानवान् |
५३ क