स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
एवं ममापि पुत्रस्य पुत्रः पितरमन्वगात् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
एवं महच्छस्त्रवर्षं सृजन्त; स्ते यातुधाना भुवि घोररूपाः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
एवं महात्मना तेन त्रीँल्लोकाञ्जनमेजय़ |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
युधिष्ठिर उवाच
एवं महावलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
एवं मां भरतश्रेष्ठो गाङ्गेय़ः प्राह शास्त्रवित् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
एवं माय़ां विकुर्वाणो योधय़ामास मां रिपुः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
एवं माय़ाशतसृजावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
एवं मृत्युं जाय़मानं विदित्वा; ज्ञाने तिष्ठन्न विभेतीह मृत्योः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं मृत्युमुखं प्राहुर्ये जनास्तत्त्वदर्शिनः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
एवं मृत्युर्देवसृष्टा प्रजानां; प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
एवं मे चरतस्तत्र सर्वय़त्नेन शत्रुहन् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
युधिष्ठिर उवाच
एवं मे छिन्धि वार्ष्णेय़ संशय़ं तार्क्ष्यकेतन |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
एवं मे निश्चिता वुद्धिः शास्तुस्तिष्ठाम्यहं वशे ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
द्रौपद्यु उवाच
एवं मे प्रतिजानीहि ततोऽहं वशगा तव ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
एवं मे भगवान्देवः स्वय़माख्यातवान्हरिः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
एवं मे रोचते सन्धिः शक्रेण सह नित्यदा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
एवं मे वसतो राजन्नेष कालोऽत्यगाद्दिवि ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं मेऽकथय़द्राजन्पुरा द्वैपाय़नो गुरुः ||
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
एवं मय़ा प्रतिज्ञातं क्षत्रमध्ये महाभुज ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं मय़ास्त्राण्युपशिक्षितानि; शक्राच्च वाताच्च शिवाच्च साक्षात् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
एवं मय़ूरवद्राजा स्वराष्ट्रं परिपालय़ेत् ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
एवं यः सर्वभूतेषु आत्मानमनुपश्यति |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
एवं यः साधुभिर्दान्तश्चरेदद्रोहचेतसा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
एवं युक्तस्य तु मुनेर्लक्षणान्युपधारय़ेत् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
एवं युक्ता भारसहा भवन्ति; महाकुलीना न तथान्ये मनुष्याः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
एवं युक्तेन कौन्तेय़ युक्तज्ञानेन मोक्षिणा ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
एवं युक्तेन मनसा ज्ञानं तदुपपद्यते ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
एवं युक्तो जय़ेत्स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
एवं युक्तो जय़ेत्स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रिय़ः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
एवं युक्तो जय़ेत्स्वर्गमूर्ध्वरेताः समाहितः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
एवं युक्तो व्राह्मणः स्यादन्यो व्राह्मणको भवेत् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
एवं युगपदुत्पन्नं दशवर्गमसंशय़म् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं युद्धानि वृत्तानि तत्र तत्र महीपते |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
एवं युय़ुधिरे तत्र कुरवः पाण्डवैः सह ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
एवं युय़ुधिरे वीराः प्रार्थय़ाना महद्यशः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं ये कुशलं शूरं हिते स्थितमकल्मषम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
एवं ये ज्ञातय़ोऽर्थेषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
एवं ये भूतिमिच्छेय़ुः पृथिव्यां मानवाः क्वचित् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवं ये विदुरध्यात्मं कैवल्यं ज्ञानमुत्तमम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
एवं यो युक्तधर्मः स्यात्सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
एवं यो राजशार्दूल दुर्वलः सन्वलीय़सा |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे |
११६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
एवं यो वेत्ति विद्वान्वै सदा व्रह्ममय़ं रथम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
एवं यो वेद कामस्य केवलं परिकर्षणम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
एवं यो व्रह्मविद्राजा व्रह्मपूर्वं प्रवर्तते |
२१ क