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अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
एवं योगवलाद्विप्रो मोहय़ामास पार्थिवम् ||
२० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
एवं योधशतान्याजौ सहस्राण्ययुतानि च |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
एवं रणे पाण्डवकोपदग्धा; न नश्येय़ुः सञ्जय़ धार्तराष्ट्राः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
एवं रम्यानसृजत्पर्वतांश्च; हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं राजकुलद्वारि मङ्गलैरभिपूजितः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं राजकुलाद्वित्तं पृथिवीं प्रतितिष्ठति ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
एवं राजन्नवहारो वभूव; ततः पुनर्विमलेऽभूत्सुघोरम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदाय़ुता |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
एवं राजन्विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जय़ः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
एवं राजसहस्राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं राजा स महात्मा ह्यतीव; स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा शीलशौचताम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
एवं रात्रौ दिवा चैव समेषु विषमेषु च |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चार्णवं दिवा |
५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
एवं रामाय़ कौरव्य वसिष्ठोऽकथय़त्पुरा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
एवं राष्ट्रमुपाय़ेन भुञ्जानो लभते फलम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
एवं राष्ट्रमय़ोगेन पीडितं न विवर्धते ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
एवं रुक्मरथः शूरो हत्वा शतसहस्रशः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
एवं रुद्राः सवसवस्तथादित्याः परन्तप |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं लक्षणसम्पन्नौ महापुरुषसञ्ज्ञितौ ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं लव्ध्वा धनं लोभाद्यजते यो ददाति च |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
एवं लव्ध्वा वरान्वाला दर्पपूर्णास्तरस्विनः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एवं लोका वदिष्यन्ति नरनाराय़णावृषी |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
एवं लोकानुरोधेन शास्त्रमेतन्महर्षिभिः |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
एवं लोकान्गमिष्यामि पुत्रैरिति न संशय़ः |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
एवं लोके यशःप्राप्तो भविष्यसि नराधिप ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
एवं लोकेष्वहिंसा तु निर्दिष्टा धर्मतः परा ||
६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तोऽस्मि भारत ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा भूत्ते वुद्धिरीदृशी ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वत्स्यामि ते गेहे यदि ते रोचतेऽनघ ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वदति वाक्यं तु युय़ुधाने महामतौ |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
एवं वदत्यङ्गिरसां वरिष्ठे; वृहस्पतौ लोकपालः कुवेरः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
एवं वदान्यो धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च सोऽभवत् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २२५
जनमेजय़ उवाच
एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः; शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
एवं वरमहं श्रुत्वा जगत्यास्तनय़े तदा |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
एवं वर्णस्य वर्णस्य समुच्चीय़ सहस्रशः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलव्रतः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वलवतः सर्वमिति वुद्ध्वा महीपते |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
एवं वलिं प्रदाय़ाथ प्रवेशं लेभिरे ततः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
एवं वलिं समादाय़ प्रवेशं लेभिरे ततः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
एवं वलेनातिवलं महास्त्रं; समुद्रकल्पं सुदुरापमुग्रम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
एवं वसन्तं यदुपप्लवेद्धन; माचार्याय़ तदनुप्रय़च्छेत् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धय़िष्याम्यहं प्रिय़म् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
एवं वसन्सर्वतो वर्धतीह; वहून्पुत्राँल्लभते च प्रतिष्ठाम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप |
३९ क