वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
वणिजश्च नरव्याघ्र वहुमाय़ा भवन्त्युत ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
वणिजश्चाभ्ययुस्तत्र देशे दिग्भ्यो धनार्थिनः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
वणिजो गणिका वारा ये चैव प्रेक्षका जनाः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
वणिजो नावि भिन्नाय़ां यथागाधेऽप्लवेऽर्णवे |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वणिजो वर्धनो वृक्षो नकुलश्चन्दनश्छदः |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
वतातपसहो ग्रीष्मे न च धर्ममविन्दत |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वत्स आह्वय़से युद्धे कर्ण पार्थं धनञ्जय़म् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
वत्स पर्याप्तमेतावद्भीष्मेण सह संय़ुगे |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्स वेद इहास्यताम् |
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
वत्सगर्गकरूषांश्च पुण्ड्रांश्चाप्यजय़द्रणे ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
वत्सदन्तैर्महेष्वासः प्रहसन्निव भारत ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
वत्सदन्तैर्विपाठैश्च क्षुरप्रैश्चटकामुखैः ||
२३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
वत्सदन्तैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे भीमसेनः समर्पय़त् ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वत्सभूमिं च कौन्तेय़ो विजिग्ये वलवान्वलात् ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वत्सराजश्च धृतिमान्कोसलाधिपतिस्तथा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
वत्सलं संविभक्तारमनु जीवन्तु त्वां जनाः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
वत्सलत्वाद्द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशय़ः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
वत्सला प्रिय़पुत्रा च प्रिय़ास्माकं जनार्दन ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
वत्सलां गुणसम्पन्नां तरुणीं वस्त्रसंवृताम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
वत्सलाः सर्वभूतानां वाच्याः श्रोत्रसुखा गिरः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
वत्साक्षय़ा च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति |
६९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
वत्सान्कलिङ्गांस्तरलानश्मकानृषिकांस्तथा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
वत्सापेक्षी दुहेच्चैव स्तनांश्च न विकुट्टय़ेत् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
वत्से शोको न ते कार्यः प्राप्येदं व्यसनं महत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
वत्सैः पुष्टैः क्षीरपैः सुप्रचारा; स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
वत्सैः प्रीताः सुप्रजाः सोपचारा; स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
वत्सैः संवर्धितो गोष्ठे स मां रक्षतु पार्थिवः ||
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सैहीति ||
२७ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सैहीति ||
५४ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोत्तङ्क उष्यतां तावदिति ||
९६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोत्तङ्क किं ते प्रिय़ं करवाणीति |
९२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोत्तङ्क वहुशो मां चोदय़सि गुर्वर्थमुपहरेय़मिति |
९८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोत्तङ्क स्वागतं ते |
१६५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
वत्सोपपन्नां नीलाङ्गां सर्वरत्नसमन्विताम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोपमन्यो केन वृत्तिं कल्पय़सि |
३५ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
वत्सोपमन्यो प्रीतोऽस्मि पश्य मां मुनिपुङ्गव |
१७५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्षं गृह्णामि |
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
वत्सौपम्येन दोग्धव्यं राष्ट्रमक्षीणवुद्धिना |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
वत्स्यते रजनीमेकां तर्पय़ित्वा दिवौकसः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वत्स्यामो निय़ताहारास्तपश्चरणतत्पराः ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
वत्स्यामो यत्र राजेन्द्र संवत्सरमिमं वय़म् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशय़ः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथ वा दिशः |
११४ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
वदतां वर्णधर्मांश्च व्राह्मणानां हि मे श्रुतम् |
२८ क