शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विकृत उवाच
मय़ास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीय़ां तत्कथं पुनः |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ाहृतां श्रिय़ं स्फीतां मोहात्समपहाय़ किम् |
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
विराट उवाच
मय़ाय़ं ताडितो जिह्मो न चाप्येतावदर्हति |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
मय़ाय़ं वृत उपाध्याय़ः |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मय़ि कृच्छ्राद्विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
मय़ि कौरव्य दुष्टात्मा मार्त्तिकावतको नृपः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
मय़ि क्रुद्धे जगन्न स्यान्मय़ि सर्वं प्रतिष्ठितम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
मय़ि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
मय़ि चाप्यपय़ाते वै गच्छमानेऽर्जुनं प्रति |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
मय़ि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
मय़ि चेदस्ति ते प्रीतिर्याचस्व पितरं मम ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि चैव यथावत्त्वं सर्वमादृत्य वर्तसे ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
धृष्टद्युम्न उवाच
मय़ि जीवति कौरव्य नोद्वेगं कर्तुमर्हसि |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कर्ण उवाच
मय़ि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
मय़ि जीवति गान्धारे न युद्धं गन्तुमर्हसि |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
मय़ि जीवति राजेन्द्र न भय़ं कर्तुमर्हसि |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
मय़ि जीवति राज्यं कः सम्प्रशासेत्पुमानिह |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि तिष्ठति दुष्टात्मन्न स्त्रिय़ं हन्तुमर्हसि ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
मय़ि नीतिर्वलं भीमे रक्षिता चावय़ोर्जुनः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
प्राण उवाच
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
मय़ि प्रचोदय़ामास तान्यहं प्रत्यषेधय़म् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
मय़ि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य; वलस्य चाप्तस्य तथैव वीर |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
प्राण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
मय़ि भक्तिं परां दिव्यामेकभावादवस्थिताम् ||
१७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
मय़ि यद्विद्यते वित्तं तच्छृणुध्वं तपोधनाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
मय़ि युद्धार्थिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
मय़ि वै त्यज्यतां क्रोधः किं मे क्रुद्धः करिष्यसि |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मय़ि शिष्ये च भृत्ये च सहाय़े च समाश्वस ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
मय़ि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
मय़ि संनिहिते चैव भीष्मे च भरतर्षभे |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
मय़ि सङ्कीर्तिते रामः सर्वं तत्ते करिष्यति ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि सञ्जातहार्दानामथ तेऽन्तर्हिता द्विजाः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
पराशर उवाच
मय़ि सम्भवतस्तस्य फलात्कृष्णो भविष्यति |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि सर्वं समासज्य कुटुम्वं भरतर्षभाः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
मय़ि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
मय़ि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
मय़ि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
मय़ि स्थिते च समरे निरुद्धेषु च पाण्डुषु |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
मय़ूखिनः परिघा लोहवद्धा; गदाश्चित्राः शितधाराश्च शूलाः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूर इति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
मय़ूर इव कौपीनं नृत्यन्सन्दर्शय़न्निव ||
९ ख