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वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं व्रुवन्नेव स यातुधानै; र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
एवं व्रुवन्पाण्डव सत्यवाक्यं; वेदीमिमां त्वं तरसाधिरोह ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
एवं व्रुवन्प्रस्खलिताश्वसूतो; विचाल्यमानोऽर्जुनशस्त्रपातैः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवन्महाराज महात्मा स महामतिः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवाणं कर्णं तु कृपः शारद्वतोऽव्रवीत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं कौन्तेय़ं धर्मज्ञं धर्मतत्त्ववित् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं कौन्तेय़ं धर्मराजोऽभ्यपूजय़त् ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं कौन्तेय़ं भीमसेनममर्षणम् |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं गोविन्दं सात्वतप्रवरं तदा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं तमुवाच भीष्मः; किं कत्थसे कालपरीतवुद्धे |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवाणं पुनराद्रवन्त; मास्वाद्य वल्गन्तमतिप्रहृष्टम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणमजिनैर्विवासितं; दुःखाभिभूतं परिनृत्यति स्म |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवाणस्तं वीरं सिंहो मत्तमिव द्विपम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
एवं व्रुवाणस्तद्वाक्यं नलः परमदुःखितः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
एवं व्रुवाणान्यदि वः प्रतिव्रूय़ाद्धि कश्चन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
एवं व्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रमः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवाणो वीभत्सुर्जय़द्रथवधोत्सुकः |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवाणो वीभत्सुर्वैराटिमपराजितः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
एवं वय़ं च धर्मश्च सर्वे चास्मत्पितामहाः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
एवं वय़ं जरासन्धादादितः कृतकिल्विषाः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
एवं वय़मसत्कारं देवेन्द्रस्यास्य दुर्मतेः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
एवं शक्रेण कौरव्य वुद्धिसौक्ष्म्यान्महासुरः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
एवं शक्रेण सम्प्राप्ता व्रह्महत्या जनाधिप |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
एवं शतसहस्राणां शतं तस्य महात्मनः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
एवं शतसहस्राणि प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
एवं शप्तस्तव भ्राता वहुभिश्चापि वञ्चितः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
एवं शप्त्वा ततः पुत्रो विनतामन्तरिक्षगः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमाङ्गिरसी शुभा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
एवं शरीरेषु शुभाशुभेषु; स्वकर्मजैर्ज्ञानमिदं निवद्धम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं शशाप भगवान्वसूंस्तान्मुनिसत्तमः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
एवं शस्त्रप्रतापेन प्रथितः सोऽभवत्क्षितौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
एवं शस्त्राणि मुञ्चन्तो घ्नन्ति वध्यानथैकदा |
७ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
एवं शास्त्रेषु भिन्नेषु वहुधा नीय़ते क्रिय़ा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
एवं शुनासमान्भृत्यान्स्वस्थाने यो नराधिपः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं शूरौ महेष्वासौ विसृजन्तौ शिताञ्शरान् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्या; देतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
एवं श्राद्धं भुक्तमनर्हमाणै; र्न चेह नामुत्र फलं ददाति ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
एवं श्रुतिरिय़ं व्रह्मन्धर्मेषु परिदृश्यते ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमय़ः स्मृतः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
एवं स एव भगवाञ्ज्ञानेन प्रतिवोधितः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
एवं स एव भगवान्पिता माता पितामहः |
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स कुञ्जो राजेन्द्र नैमिषेय़ इति स्मृतः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स कृत्वा समय़ं सृष्ट्वा नीहारमीश्वरः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स कृत्वा ह्यात्मानं चतुर्धा भगवान्प्रभुः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स गुणसम्पन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः |
३ क