उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यास्त्वामद्य नार्चन्ति पाञ्चालाश्च सकेकय़ाः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
मत्स्येवोदकमन्वेति प्रवर्तति प्रवर्तनात् |
७२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यैरन्यैश्च सन्धाय़ कौरवैः संन्यवर्तत ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवांस्तथा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
मत्स्यो यथा स्रोत इवाभिपाती; तथा कृतं पूर्वमुपैति कर्म |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
मत्स्यो यथान्यः स्यादप्सु सम्प्रय़ोगस्तथानय़ोः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानिह ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यो राजा रुक्मरथः सपुत्रः; प्रहारिभिः सह पुत्रैर्विराटः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
मत्स्यो विराटो वलवानभिरक्षेत्स पाण्डवान् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
सहदेव उवाच
मत्स्यो विराटो वलवान्कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
मत्स्यो ह्यस्माभिराय़ोध्यो यद्यागच्छेद्गवां पदम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
मत्स्योदकं समासाद्य तदा भरतसत्तम ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
मत्स्योऽन्यत्वं यथाज्ञानादुदकान्नाभिमन्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
मत्स्योऽम्भसि यथा तद्वदन्यत्वमुपलभ्यते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथं मेऽद्य गमिष्यसि ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
मथितैराश्रमैर्भग्नैर्विकीर्णकलशस्रुवैः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
मथ्यमानेव दुःखेन हृदय़ेन पृथा ततः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
मथ्यमानेऽमृते जातमश्वरत्नमनुत्तमम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
मदं च व्यभजद्राजन्पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
मदं नामासुरं विश्वरूपं; यं त्वं दृष्ट्वा चक्षुषी संन्यमीलः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
मदं प्रमादं पुरुषेषु हित्वा; संय़च्छ भावं प्रतिगृह्य मौनम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
मदं मन्त्राहुतिमय़ं व्यादितास्यं महामुनिः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
मदः प्रमादो दर्पश्च दम्भो धैर्यं नय़ानय़ौ ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
मदङ्गेभ्यः प्रसूतानि मदाश्रय़कृतानि च |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
वासुदेव उवाच
मदधिष्ठितत्वात्समरे न विशीर्णः परन्तप ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रिय़ं मम |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय़ परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
मदन्तरे त्वद्ध्वजिनीं प्रवेष्टा; कक्षं दहन्नग्निरिवोष्णगेषु ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मदन्यं नानुपश्यामि प्रतिवीरं तवाहवे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद्वास्त्रवित्तमः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ||
१९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
मदमूर्छान्वितात्मानं प्रमदेवाध्वनि स्थिता ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
मदर्थं तमृषिं देवी क्षमय़ामास भार्गवम् |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
मदर्थं दुष्करं कर्म कृतं तेन महात्मना ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
मदर्थं निहता युद्धे रामेणाक्लिष्टकर्मणा ||
७६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मदर्थं प्रतिय़ुध्येतां मानार्हौ सत्यसङ्गरौ ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
मदर्थं विष्ठिता नूनं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
मदर्थमद्य संय़त्ता दुर्योधनवशानुगाः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
मदर्थमुद्यतं शूरं प्राणांस्त्यक्त्वा महारथम् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मदर्थमुद्यताः सर्वे प्राणांस्त्यक्त्वा रणे प्रभो ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
मदर्था भवदर्था ये ये मदीय़ास्तवैव ते ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
दुर्योधन उवाच
मदर्थे देविता चाय़ं शकुनिर्मातुलो मम ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
मदर्थे पार्थिवाः सर्वे तद्विद्धि कुरुसत्तम ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकसः |
२ क