द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
भ्रान्तसर्वमहाभूतमावर्जितदिवाकरम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
भ्रान्तासिरचरन्मार्गान्दर्शय़न्वीर्यमात्मनः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुच्छ्रितम् |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
भ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्व्वरवर्चसम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
भ्राम्योत्क्षिप्ता शरैः सापि द्रौणिनाभ्याहतापतत् ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
भ्रामय़न्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि माय़या ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
भ्रामय़ामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
भ्रामय़ित्वा महाचर्म चामीकरविभूषितम् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रामय़ित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रामय़ित्वा शतगुणं भुजाभ्यां भरतर्षभ |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रुकुटिं च पुनः कुर्वन्नोष्ठौ च विलिहन्निव |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षन्ते च परस्परम् ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षमाणान्समन्ततः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
भ्रुकुटीकृतवक्त्रान्तं क्रोधादुद्वृत्तचक्षुषम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रुकुटीपुटदुष्प्रेक्ष्यमभवत्तस्य तन्मुखम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
भ्रुवोरनन्तरास्तस्य ग्रहा दानवसत्तम |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य; क्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
भ्रूणहं नहुषं त्वाहुर्न ते होष्यामहे हविः ||
४७ ग
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यादसंशय़म् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यान्न संशय़ः ||
२०५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रूणहत्याकृतं पापं भविष्यत्यसुखावहम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
भ्रूणहत्यासमं चैतदुभय़ं यो निषेवते ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
भ्रूणहा गुरुतल्पी च यश्च स्यात्पानपो द्विजः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
भ्रूणहाहवमध्ये तु शुध्यते शस्त्रपातितः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
भ्रूणहेत्युच्यते व्रह्मन्स इह व्रह्मवादिभिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
भय़ं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मय़ा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
भय़ं तथा रिपुषु समादधद्भृशं; वणिग्गणानां क्षुभितो यथार्णवः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
भय़ं तस्य न मर्त्येभ्यो नामर्त्येभ्यः कथञ्चन |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
भय़ं तीव्रमनुप्राप्तो द्रुपदः पृथिवीपतिः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
भय़ं तु ते व्येतु विषादमोहौ; त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
भय़ं तु सुमहत्प्राप्तं धार्तराष्ट्रं महद्वलम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
भय़ं ते व्येतु वामोरु शृणु चेदं वचो मम ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
भय़ं त्यक्त्वा रणे शूरा व्रह्मलोकपुरस्कृताः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
भय़ं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व; कं ते कामं तपसा साधय़ामि ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
भय़ं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
भय़ं नागेन्द्र तस्माद्वै सर्पसत्रात्कथञ्चन ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
भय़ं नाभ्याविशेत्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
भय़ं निद्रां तथा श्वासं पौरुषं विषय़ांस्तथा ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
भय़ं परिहरन्मन्द आत्मानं परिपालय़न् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
भय़ं पश्यसि यच्च त्वमाह्वय़िष्यति मां पुनः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
भय़ं मे वै जाय़ते साध्वसं च; दृष्ट्वा कृष्णावेकरथे समेतौ ||
४८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
भय़ं मे सुमहज्जातं विस्मय़श्चैव सञ्जय़ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
भय़ं विपुलमस्मासु तावधत्तां नरोत्तमौ |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
भय़ं विपुलमादाय़ निश्चेष्टा समपद्यत ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
भय़ं विवेश पाण्डून्वै सर्वानेव ससोमकान् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
भय़ं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
भय़ं शक्राद्व्येतु ते राजसिंह; प्रणोत्स्येऽहं भय़मेतत्सुघोरम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
भय़ं हि शङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति ||
४५ ख