वन पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
एवं करिष्यामि यथा व्रवीषि; परां वुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१३६
यवक्रीरु उवाच
एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथञ्चन |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
एवं कर्म कृतं चित्रं विषय़स्थं पृथक्पृथक् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः ||
७५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
एवं कर्माणि यानीह वुद्धिय़ुक्तानि भूपते |
२१ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कलत्रमानीय़ वृष्णीनां हृतशेषितम् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
एवं कल्याणमातिष्ठन्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
५३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
एवं कार्यस्य योगार्थं वुद्धिं कुर्वन्ति मानवाः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
एवं कालविभागेन कालचक्रं प्रवर्तते ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
एवं कुरु न चान्या ते वुद्धिः कार्या कदाचन |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
एवं कुरूणां पतिते शृङ्गे भीष्मे महौजसि |
१०१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै सञ्जय़ पूजितः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
एवं कुर्वञ्शुभा वाचो लोकेऽस्मिञ्शृणुते नृपः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं कृच्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
एवं कृतस्वस्त्ययनस्तय़ाहं; तामभ्यनुज्ञाय़ कपीन्द्रपुत्रीम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कृतास्त्रः कौन्तेय़ो गान्धर्वं वेदमाप्तवान् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
एवं कृते कृतं चैव तव कार्यं भविष्यति ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
एवं कृते कृतं मह्यं सर्वकामैर्भविष्यति ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
एवं कृते तु सन्धाने वृत्रः प्रमुदितोऽभवत् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कृते न ते दोषो भविष्यति विशां पते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ||
५२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
एवं कृतोदका नार्यः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वय़म् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
एवं कृत्वा तु समय़ं श्रीर्गोभिः सह भारत |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
एवं कृत्वा नमस्तस्मै महादेवाय़ रंहसे |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
एवं कृत्वा नरेन्द्रो हि न खेदमिह विन्दति ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
एवं कृत्वा रणे कर्ण आरुरोह रथं पुनः |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
एवं कृत्वा वलिं सम्यग्दद्याद्भिक्षां द्विजातय़े |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
एवं कृत्वा स भगवांस्ततोऽन्यद्रूपमात्मनः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
एवं कृत्वाव्रवीत्पार्थो वासुदेवं धनञ्जय़ः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कृतय़ुगे सम्यग्वर्तमाने तदा नृप |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कृष्णा विराटस्य भार्यया परिसान्त्विता |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं कृष्णां मोक्षय़ित्वा विनिर्जित्य जय़द्रथम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
एवं कोशस्य महतो ये नराः परिपन्थिनः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
एवं कौतूहलं कृत्वा दृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
एवं कौन्तेय़ भूतानि तं तं धर्मं तथा तथा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणाः समन्ततः |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
एवं क्रमेण सर्वांस्तानाश्रमान्दानवास्तदा |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं क्रमेण सर्वास्ताः शीलवत्यः कुलस्त्रिय़ः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एवं क्रोशत्सु वेदेषु कुतो मोक्षोऽस्ति कस्यचित् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
एवं क्लान्तमना राजन्नुपाय़ाद्द्रोणमीक्षितुम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं क्लेशैः सुवहुभिः क्लिश्यमानाः सुदुःखिताः |
१०४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
एवं खलु कपोतश्च कपोती च पतिव्रता |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं ख्यातो नरपते लोकेऽस्मिन्स वनस्पतिः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
एवं गच्छति मेधावी तत्त्वय़ोगविधानवित् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
एवं गते किं नु भद्रे शक्यं कर्तुं तपस्विभिः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
एवं गते किं नु शक्यं भद्रे कर्तुं मनीषिभिः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते ततस्तस्मिन्पितरीवाश्वसञ्जनाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
एवं गते तु कृत्येऽस्मिन्व्रूहि यत्ते विवक्षितम् |
९ क