अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
वालखिल्या ऊचुः
एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
कृशतनुरु उवाच
एकपुत्रः पिता पुत्रे नष्टे वा प्रोषिते तथा |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
एकपुत्रः स विप्राग्र्य वाल एव च सोऽनघ |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
एकपुत्रमपुत्रं वै प्रवदन्ति मनीषिणः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
एकपुत्रविहीनानां सर्वेषां जीवितार्थिनाम् |
१०८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
एकप्रहाराभिहतान्भीमसेनेन कुञ्जरान् |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
एकप्राणावुभौ कृष्णावन्योन्यं प्रति संहतौ |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
एकभर्तृत्वमेवास्तु सत्यं यद्यस्ति वा मय़ि ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
एकमन्तमुपाश्लिष्टा नागराज्ञो महासुराः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
एकमप्यास्थितः सम्यगुभय़ोर्विन्दते फलम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एकमालम्वमानानां निर्णय़े किं निरामय़म् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
एकमासं निराहारः सिद्धिं मासेन स व्रजेत् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
एकमासं निराहारः सोमलोकमवाप्नुय़ात् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
एकमासं निराहारः स्वय़ं पश्यति देवताः ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
एकमासं निराहारस्त्वन्तर्धानफलं लभेत् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
द्रौपद्यु उवाच
एकमाहुर्वैश्यवरं द्वौ तु क्षत्रस्त्रिय़ा वरौ |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
एकमूर्तिकृते वीरः कुमारः समपद्यत ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
एकमेकं समाहूय़ युद्धाय़ैवोपतस्थिरे ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
एकमेके पृथक्चान्ये वहुत्वमिति चापरे ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
एकमेव तु ये पातं विदुः सर्वे विहङ्गमाः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
एकमेव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ||
१३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
एकमेव हि लोकेऽस्मिन्नात्मनो गुणवत्तरम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
एकमेवाद्वितीय़ं तद्यद्राजन्नाववुध्यसे |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
कर्ण उवाच
एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
एकराज्यं कुरूणां स्म चिकीर्षति युधिष्ठिरे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
एकराज्यावेकगृहावेकशय़्यासनाशनौ |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः |
१५९ क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
एकरात्रमुषित्वेह द्वितीय़ं यदि वत्स्यसि |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
एकरात्रा शमीगेहे महोलूखलमेखला ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजय़ः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
एकरात्रोषितः कञ्चिदपश्यं व्राह्मणं पथि ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
एकरात्रोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ||
१०९ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
एकरात्रोषितो राजन्प्रय़च्छेत्तिलधेनुकाम् |
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ||
८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
एकरूपं द्विधेत्येके व्यामिश्रमिति चापरे |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमाय़ान्तमन्तिकात् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीय़माणोऽव्रवीदिदम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षय़े ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
एकवर्णैः सुकृष्णाङ्गैर्वाह्लिजातैर्हय़ोत्तमैः |
६ क