उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
एते सेनाप्रणेतारो वीराः सर्वे तनुत्यजः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
एते स्थास्यन्ति सङ्ग्रामे पाण्डवानां वधार्थिनः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
एते स्वर्गे महीय़न्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
एते स्वां प्रकृतिं प्राप्ता वैदेह तपसोऽऽश्रय़ात् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
एते हनिष्यन्ति रणे पाञ्चालान्युद्धदुर्मदान् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
एते हि देवा वसवो विमाना; न्यास्थाय़ सर्वे ज्वलिताग्निकल्पाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
एते हि धर्ममेवादौ वर्णय़न्ति सदा मम |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
एते हि धार्तराष्ट्राणां सर्वे दोषास्त्रय़ोदश |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
एते हि नित्यसंन्यासा दृश्यन्ते निरुपद्रवाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
एते हि निहताः सङ्ख्ये तुल्यतेजोवलैर्नरैः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
दुर्योधन उवाच
एते हि निहताः सर्वे प्रस्कन्नाः पाण्डुवाहिनीम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दमान्विताः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
एते हि वहवः शूराः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः |
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
एते हि वहवः सूत दुर्निवार्याश्च संय़ुगे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
एते हि विवुधाः सर्वे पुरन्दरमुखा दिवि |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
एते हि सर्वे कुरवः समेताः; क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
एते हि सर्वे मम राजपुत्राः; प्रहृष्टरूपाः पदवीं चरेय़ुः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे सन्त्यक्तजीविताः ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
एते हि सोमका विप्र पाञ्चालाश्च यशस्विनः |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखय़ोः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखय़ोः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखय़ोः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
एते ह्यपि यथैवाहं मन्तुमर्हसि तांस्तथा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
एते ह्यभिमुखाः सर्वे राधेय़ेन युय़ुत्सवः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
एते ह्यमात्याः कर्तव्याः सर्वकर्मस्ववस्थिताः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
एते ह्यामरणात्पञ्च षड्गुणा ज्ञानसिद्धय़े ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
एते ह्यामुच्य भगवन्क्षुत्पिपासाभय़ं कुतः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वाहुक उवाच
एते हय़ा गमिष्यन्ति विदर्भान्नात्र संशय़ः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजाय़थाः |
५१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
एतेन किल पार्थस्य युद्धमासीत्सुदारुणम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
एतेन केवलं याति त्यक्त्वा देहमसाक्षिकम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
एतेन चाभ्युपाय़ेन ध्रुवं ग्रहणमेष्यति ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
एतेन चाहं सन्तप्ता प्राप्ता शक्र तवान्तिकम् |
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एतेन तूर्णं प्रतिपादय़ेमा; ञ्श्वेतान्हय़ान्काञ्चनरश्मिय़ोक्त्रान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
एतेन त्वं प्रकारेण महतो भेत्स्यसे गणान् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
एतेन त्वपराधेन शापात्तस्य महात्मनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
एतेन निय़मेनासीद्वर्षाण्यष्टादशैव तु |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
एतेन नेष्टवान्कश्चिदृते विष्णुं पुरातनम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
एतेन युद्धमभवत्पुरा गाण्डीवधन्वनः |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
एतेन युध्यमानस्य यत्तः संय़च्छ मे हय़ान् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
एतेन वालेन हि शम्वरस्य; दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथा नलः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत पण्डितः ||
१४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
एतेन व्रह्मचर्येण देवा देवत्वमाप्नुवन् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
एतेन व्रह्मचर्येण सूर्यो अह्नाय़ जाय़ते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
एतेन समय़ेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
एतेन समय़ेनैनमामन्त्रय़ वरानने ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एतेन सर्वमेवेदं विद्ध्यभिव्याप्तमन्तरम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
एतेन सहितो युध्य पाञ्चालैश्च महारथैः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रय़ोदश |
४ क