chevron_left  मरीचिरङ्गिराarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
मरीचिरङ्गिरात्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
मरीचिविकचः श्रीमान्नाराय़ण उरोगतः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
मरीचिविकचस्येव राजन्भानुमतो वपुः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात्तु इमाः प्रजाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तस्य द्वे नामनी श्रुते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिवः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
मरुं साधय़तो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
मरुं साधय़तो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतः परिवेष्टारः साध्याश्चासन्महात्मनः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
मरुतः सर्वतो राजन्सर्वे च गृहमेधिनः |
६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह |
७ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतश्च सहेन्द्रेण दिशश्च सदिगीश्वराः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतश्च सहेन्द्रेण वसवश्च सहाश्विनौ ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवास्तथासुराः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवास्तथैव च |
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
मरुतश्चूर्णितान्पश्य येऽहसन्त महोदधिम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
मरुतां च गणास्तत्र देवय़ानैरुपागमन् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मरुतां तु गणाद्विद्धि सञ्जातमरिमर्दनम् |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
मरुतो मारुतश्चैव सागराः सरितस्तथा ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
मरुतो वसवः साध्या विश्वेदेवाः सनातनाः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्चैव भारत |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
वृहस्पतिरु उवाच
मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
मरुत्तं मनुमिक्ष्वाकुं गय़ं भरतमेव च |
१६८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ||
२७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
वृहस्पतिरु उवाच
मरुत्तमाहुर्मघवन्यक्ष्यमाणं; महाय़ज्ञेनोत्तमदक्षिणेन |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
मरुत्तश्च मरीचिश्च स्थाणुश्चात्रिर्महातपाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
मरुत्तस्यान्ववाय़े तु क्षत्रिय़ास्तुर्वसोस्त्रय़ः |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
मरुत्तेन महावुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
मरुत्तेन हि राज्ञाय़ं गीतः श्लोकः पुरातनः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महाय़शाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
मरुत्पतिसमा वीर्ये समुद्रेणाभिरक्षिताः ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
मरुद्गण उपस्पृश्य पितॄणामाश्रमे शुचिः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्गणवृतः पार्थं माधवं चाव्रवीदिदम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्गणवृतः शक्रः शुशुभे भासय़न्दिशः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्गणा मरुत्तस्य यत्सोममपिवन्त ते |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
मरुद्गणाद्भीमसेनं वलवन्तमरिन्दमम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
युधिष्ठिर उवाच
मरुद्गणैः परिवृतः साक्षादपि शतक्रतुः |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्भिः परिसंस्तीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ||
३४ ख