chevron_left  भुजगानामशेषाणांarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
भुजगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुतिः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
भुजङ्ग इव निर्मोकात्पूर्वभुक्ताज्जरान्वितात् ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
भुजङ्गभक्षः परमार्चितः खगै; रहीनकीर्तिर्विनतामनन्दय़त् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
भुजङ्गभोगवदना नानागुल्मनिवासिनः ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
शौनक उवाच
भुजङ्गमानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
भुजनक्रा धनुःस्रोता हस्तिशैला हय़ोपला |
३० क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
भुजप्रहारसंय़ुक्तं वृत्रवासवय़ोरिव ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
सोम उवाच
भुजवीर्या हि राजानो वागस्त्राश्च द्विजातय़ः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
द्रोण उवाच
भुजवीर्यार्जिताँल्लोकान्दिव्यान्प्राप्स्यस्यनुत्तमान् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
भुजवेगमशक्ता मे सोढुं पन्नगसत्तम ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
भुजाः सवज्राङ्गुलय़ः समुच्छ्रिताः; ससिंहनादा हृषितैर्दिदृक्षुभिः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
भुजानां च महाराज स्कन्धानां च समन्ततः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
भुजान्परिघसङ्काशान्हस्तिहस्तोपमान्रणे ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकर्षाते गजाविव ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
भुजाभ्यां परिगृह्यैनां चुक्रुशुः परमार्तवत् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महावलम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकाय़ौ महावलौ ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
भुजाभ्यां योक्त्रय़ित्वा तं वलवान्पाण्डुनन्दनः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
उत्तङ्क उवाच
भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
भुजावाश्रित्य रमते सुभुजस्य मनस्विनी ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
भुजावुच्छ्रित्य शस्त्रं च शव्देन महता ततः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
भुजेन स्वैरमुक्तेन निष्पिष्टोऽस्मि महीतले ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
भुजैश्छिन्नैर्महाराज नागराजकरोपमैः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
भुजैश्छिन्नैर्महाराज शरीरैश्च सहस्रशः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
भुजौ धराय़ां पतितौ नृपस्य तौ; विवेष्टतुस्तार्क्ष्यहताविवोरगौ ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
भुजौ शिरश्च स्वक्षिभ्रु क्षितौ क्षिप्रमपातय़त् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
भुजौ शिरश्चेन्द्रसमानवीर्य; स्त्रिभिः शरैर्युगपत्सञ्चकर्त ||
६३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
भुज्यतामिति तेनोक्ताः कृष्णभीमधनञ्जय़ाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
भुज्यन्ते यज्वनां लोकाः क्षमिणामपरे तथा ||
४० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्त्वमचेतनम् |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
भुज्यमाना ह्ययोगेन स्वराष्ट्रादभितापिताः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वनः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
दुर्योधन उवाच
भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
भुञ्जते व्रह्मकामाय़ व्रतलुप्ता भवन्ति ते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
भुञ्जन्ते देवशेषाणि तान्नमस्यामि यादव ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
भुञ्जानं चान्नविषय़ान्विषय़ं विद्धि कर्मणाम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च |
७ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जानाः सर्वभोज्यानि रसवन्ति फलानि च |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
भुञ्जानो मनुजव्याघ्र नैव शङ्कां समाचरेत् |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
भुञ्जानो यावकं रूक्षं दीर्घकालमरिन्दम |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
भुञ्जानौ मानुषान्भोगान्यथावत्पर्यधावताम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
भुञ्जीत सान्त्वय़ित्वैव यथासुखमय़त्नतः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
भुञ्जेमां पृथिवीं राजन्भ्रातृभिः सहितः सुखी |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचय़त् ||
१९ ख