सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
एवमेते रथाः सप्त राजन्नन्यान्निवोध मे |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
एवमेते वरा लव्धाः पुरस्ताद्विद्धि शौरिणा |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
एवमेते वलौघेन परस्परवधैषिणः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेते समुत्पन्ना मरुतां जनय़िष्णवः ||
३२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
एवमेतेन भाव्यं हि नूनं कार्येण तत्त्वतः |
६५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
एवमेतेऽदितेः पुत्रा मारुताः परमाद्भुताः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
एवमेतेऽर्चिताः सर्वे प्रय़च्छन्ति शुभं नृणाम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
एवमेतैर्मनुष्येन्द्र शूरैः प्राज्ञैर्वहुश्रुतैः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेतैर्महाभागैर्महर्षिगणसाधुभिः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
एवमेतौ महात्मानौ वलसेनाग्रगावुभौ |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेतौ महावीर्यौ तौ पश्यत समागतौ |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
एवमेनं विजानीहि आचार्यं पितरं गुरुम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
एवमेव किलैतानि प्रिय़ाण्येवाप्रिय़ाणि च |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
एवमेव कुले जाताः पावकोपमतेजसः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
एवमेव कृतप्रज्ञो न दोषैर्विषय़ांश्चरन् |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
एवमेव गुणैर्युक्तो यो न रज्यति भूमिपम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षय़े |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
एवमेव च मां नित्यं व्राह्मणाः सन्दिशन्ति वै |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
एवमेव च राजेन्द्र विज्ञेय़ं ज्ञेय़चिन्तकैः ||
३३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
एवमेव तु गोविन्दमर्जुनः प्रत्यभाषत |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
एवमेव द्विजेन्द्राणां क्षत्रिय़ाणां विशामपि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
एवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसाहृतम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
एवमेव निराचान्तो यश्चाग्नीनपविध्यति ||
५६ ग
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव पृथग्दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
एवमेव प्रकुप्यन्ति राज्ञोऽप्येते ह्यभीक्ष्णशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
एवमेव प्रजाः सर्वा राजानमभिसंश्रिताः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
एवमेव प्रशंसन्ति पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
एवमेव भवत्वस्य स्त्रीत्वं पापस्य गुह्यकाः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाल्पकं नरः |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
एवमेव मनुष्येषु विशेषो नास्ति कश्चन ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव मनुष्येषु स्याच्च सर्वप्रजास्वपि |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव महावाहुर्वासुदेवो महाद्युतिः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
एवमेव महेष्वास प्रिय़वाक्यान्महीपते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
एवमेव यदा विद्वान्मन्येतातिवलं रिपुम् |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव यदुश्रेष्ठं पार्थः कार्यार्थसिद्धय़े |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
एवमेव विकुर्वाणः सर्गप्रलय़कर्मणी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
एवमेव विना राज्ञा विनश्येय़ुरिमाः प्रजाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामतिः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
एवमेव शरीराणि प्रकाशय़ति चेतना ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
एवमेव सदा दण्डं क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़े दधुः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनञ्जय़ |
६७ क