सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
मत्वा शिलासमां तोय़े पतितोऽस्मि नराधिप ||
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
मत्वात्मानमपराद्धं स तस्य; जग्राह पादौ शिरसा चार्तरूपः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
मत्संश्रितं यदात्थ त्वं वचः पुरुषसत्तम |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मत्संश्रय़ादिमे दूत सुखिनो भ्रातरो हि मे ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
कृष्ण उवाच
मत्संहननतुल्यानां गोपानामर्वुदं महत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
मत्सकाशमनुप्राप्तः प्राणगृध्नुरय़ं द्विजः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
मत्सकाशमनुप्राप्तावेतौ वुद्धिमवेक्ष्य च ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
मत्सकाशे च तैरुक्तं तदवेक्षितुमर्हसि ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
मत्समीपं द्विजश्रेष्ठ नागन्तव्यं कथञ्चन ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
अर्जुन उवाच
मत्समो यदि सङ्ग्रामे शरासनधरः क्वचित् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
मत्समो हि गदाय़ुद्धे पृथिव्यां नास्ति कश्चन |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
दुर्योधन उवाच
मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जय़ाम्येनं दुरोदरम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
मत्सरश्च विवित्सा च परितापस्तथा रतिः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
मत्सरश्चैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सात्यकिरु उवाच
मत्साय़कचिताङ्गानां रुधिरं स्रवतां वहु |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
मत्स्नेहाच्चैव राधाय़ाः सद्यः क्षीरमवातरत् |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
मत्स्यं वा पुनराय़ातमथ वापि शतक्रतुम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यगन्धो महानासीत्पुरा मम जुगुप्सितः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यपाञ्चालचेदीनां तमेकमभिधावताम् ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यमेषाननाश्चान्ये अजाविमहिषाननाः ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जाय़ति मानुषः |
१०५ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे वलाद्वली ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यराजः परामृष्टस्त्रिगर्तेन सुशर्मणा |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यराजगृहावासादवरोधेन कर्शितान् |
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यराजो महाप्राज्ञः प्रहृष्ट इदमव्रवीत् |
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
मत्स्यराज्ञः समक्षं च तस्य धूर्तस्य पश्यतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मत्स्यरूपेण यूय़ं च मय़ास्मान्मोक्षिता भय़ात् ||
४८ ग
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
मत्स्यस्त्वक्षानवावध्नादेकलव्य उपानहौ |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यस्य पुत्रं द्विषतां निहन्ता; वैराटिमामन्त्र्य ततोऽभ्युवाच ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यस्य राज्ञस्तु सुसंनिकृष्टौ; जनार्दनश्चैव युधिष्ठिरश्च ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
मत्स्या ग्रसन्ते मत्स्यांश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
मत्स्या दुर्योधनं जग्मुः शकुनिं च विशां पते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
मत्स्या वभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसङ्कर्षणेन च ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यांश्चैवाजय़त्सर्वान्भारद्वाजो महारथः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यांस्त्रिगर्तान्पाञ्चालान्कीचकानन्तरेण च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
मत्स्याः शाल्वेय़सेनाश्च द्रोणमाजग्मुरञ्जसा ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
मत्स्याः शाल्वेय़सेनाश्च द्रोणमेव यय़ुर्युधि ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
मत्स्याः संन्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
मत्स्याः सुकुट्यः सौवल्याः कुन्तलाः काशिकोशलाः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
मत्स्याञ्जित्वाजय़च्चेदीन्कारूषान्केकय़ानपि |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
मत्स्यानां केकय़ैः सार्धमभीताश्वरथद्विपम् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
मत्स्यानां विप्रकारांस्ते वहूनस्मानकीर्तय़न् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
मत्स्याविव महाजालं विदार्य विगतज्वरौ |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरव्रवीत् ||
९ ख