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वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्वुधाः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एवं स्तुतः स भगवान्गुह्यैस्तथ्यैश्च नामभिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
एवं स्तुतः स भगवान्पुरुषः सर्वतोमुखः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
एवं स्तुतः सुपर्णस्तु देवैः सर्षिगणैस्तदा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स्तुतस्ततस्तेन मन्दपालेन पावकः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय २२
सूत उवाच
एवं स्तुतस्तदा कद्र्वा भगवान्हरिवाहनः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ५०
सूत उवाच
एवं स्तुताः सर्व एव प्रसन्ना; राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाहः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्णः; सभामध्ये प्रीतिमान्पुष्कराक्षः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
एवं स्तुतो हव्यवाहो भगवान्कविरुत्तमः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मना |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेवः सहार्जुनः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽभवत् ||
१११ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽव्रवीत् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
एवं स्तुत्वाहमीशानं पाद्यमर्घ्यं च भक्तितः |
१६७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
एवं स्तुवन्नपि नागान्यदा ते कुण्डले नालभदथापश्यत्स्त्रिय़ौ तन्त्रे अधिरोप्य पटं वय़न्त्यौ ||
१४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
स्त्र्यु उवाच
एवं स्त्रिय़ा महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
एवं स्त्री नापराध्नोति नर एवापराध्यति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
कपिल उवाच
एवं स्थितस्य शास्त्रस्य दुर्विज्ञेय़ं वलावलम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
एवं स्वराज्यनाशे त्वं शोकं सम्प्रसहिष्यसि ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
एवं स्वशिविरं प्राय़ाज्जित्वा शत्रून्धनञ्जय़ः |
५१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
नारद उवाच
एवं स्वेनाग्निना राजा समाय़ुक्तो महीपते |
७ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात्कर्मणस्तथा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
एवं हत्वा तव गजांस्ते पाण्डुनरकुञ्जराः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
एवं हि कथय़न्त्यन्ये नरा ज्ञानविदः पुरा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
एवं हि क्रीडतस्तस्य नहुषस्य महात्मनः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं मकरालय़म् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
एवं हि तपसा युक्तमर्कवत्तमसः परम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
एवं हि दानवन्तश्च क्रिय़ावन्तश्च सर्वशः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
एवं हि धर्ममास्थाय़ येऽपि स्युः पापय़ोनय़ः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
एवं हि परमात्मानं केचिदिच्छन्ति पण्डिताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
एवं हि परिसङ्ख्याय़ ततो ध्याय़ेत केवलम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
एवं हि परिसङ्ख्याय़ साङ्ख्याः केवलतां गताः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा; यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
एवं हि मे कथय़ति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
एवं हि यो वेद गुहाशय़ं प्रभुं; नरः पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
एवं हि यो व्राह्मणो यज्ञशीलो; गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
एवं हि वरदं नाम केशवेति ममार्जुन |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि वर्तमानेऽहं त्वय़ि वत्स्यामि पार्थिव |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि वैश्यशूद्राणां क्षत्रिय़ाणां तथैव च |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १८७
युधिष्ठिर उवाच
एवं हि व्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशां पते ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि श्रुतमस्माभिर्देवलोके महाव्रते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
एवं हि सर्वे गतवुद्धिभावा; जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
एवं हि सुकृतं मन्ये भवतां विदितो ह्यहम् |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
एवं हि सुमहान्कालो व्यत्यक्रामत्स तस्य वै ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि सुमहाभागो नारदो गुरवे मम |
७९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
एवं हीनेषु व्रात्येषु वाह्लीकेषु दुरात्मसु |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २५७
जनमेजय़ उवाच
एवं हृताय़ां कृष्णाय़ां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९५
जनमेजय़ उवाच
एवं हृताय़ां कृष्णाय़ां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं हृताय़ां कृष्णाय़ां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं हृताय़ां वैदेह्यां रामो हत्वा महामृगम् |
१० क