वन पर्व
अध्याय
४०
भगवानु उवाच
भो भो फल्गुन तुष्टोऽस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
भो भो महर्षे वासिष्ठ व्रह्मघोषो न वर्तते |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
भो भो माय़ा यदृच्छा वा न विद्मः किमिदं भवेत् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोऽस्मि पाण्डवः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
वाय़ुरु उवाच
भो भो राघव सत्यं वै वाय़ुरस्मि सदागतिः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ; सभाज्यस्त्वं त्वय़ि सर्वं समृद्धम् |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राजन्न दग्धव्यमेतद्विदुरसञ्ज्ञकम् |
३१ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राजन्नवेक्षस्व पतितोऽहं प्रिय़स्तव |
२४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राजन्महाप्राज्ञ प्रीतोऽस्मि तव पुत्रक |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो विदुर राजाहं दय़ितस्ते युधिष्ठिरः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
व्यास उवाच
भो भो विप्रर्षभ श्रीमन्मा व्यथिष्ठाः कथञ्चन |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
भो भो व्रह्मन्नहं राजा परिक्षिदभिमन्युजः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो व्राह्मण धर्मज्ञ किमर्थं नरिनर्त्सि वै |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो शक्रात्मज श्रीमाञ्शक्रस्त्वां द्रष्टुमिच्छति |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
भो भोः केऽत्राश्रमे सन्ति भृगोः शिष्या महात्मनः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
भो भोः पुत्र स्थीय़तां तावदद्य; यावच्चक्षुः प्रीणय़ामि त्वदर्थम् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
भो भोः सव्रह्मका देवा ऋषय़श्च तपोधनाः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
भो राजन्केन यष्टव्यमजेनाहो स्विदौषधैः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
भोः क एष मम भ्रातुर्जटाय़ोः कुरुते कथाम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
राजधर्मो उवाच
भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षाय़णी च मे |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
भोः किमागमने कृत्यमिति तस्याश्च निःसृता |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
भोः पौष्य प्रीतोऽस्मीति ||
१२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
भोः फेनं पिवामि यमिमे वत्सा मातृणां स्तनं पिवन्त उद्गिरन्तीति ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
भोः सुय़ोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोद्वह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
भोक्तव्यमिति यः खिन्नो दोषवुद्धिः स उच्यते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
भोक्तव्यानि मय़ैतानि देवलोकगतेन वै |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महावलः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
भोक्ष्यथास्य महासत्त्वास्तपसः फलमुत्तमम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
देव्यु उवाच
भोक्ष्यन्ते वै सप्ततिर्वै शतानि; गृहे तुभ्यमतिथीनां च नित्यम् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
भोक्ष्यसे पृथिवीं कृत्स्नां किं मय़ा त्वं करिष्यसि ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
भोगवत्यां तथा राजन्कौशिकस्याश्रमे तथा ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः ||
११२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः |
११९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
भोगा यस्मात्प्रतिष्ठन्ते व्याप्य सर्वान्सुरासुरान् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमर्हसि ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
भोगान्भुङ्क्षे रसान्भुङ्क्षे यथैतन्मन्यते तथा ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
भोगे चाय़ुषि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
भोगे भाग्ये प्रसवने सर्वलोकनिदर्शने |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
भोगेन महता सर्पः समन्तात्पर्यवेष्टय़त् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
भोगेष्वदय़मानस्य भूतेषु च दय़ावतः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तय़ापहृतचेतसाम् |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
भोजं च कृतवर्माणं सहिताञ्शरविक्षतान् ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
भोजं तु कृतवर्माणं युय़ुधानो युय़ुत्सति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
भोजनं च समानाय़्य यत्तदादीपितं मय़ा |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
भोजनं चात्र कौरव्य प्रजाः स्वय़मुपस्थितम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
भोजनं चोरय़ित्वा तु मक्षिका जाय़ते नरः |
९३ क