chevron_left  मामेवाभिमुखंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
मामेवाभिमुखं तूर्णं गजाश्वरथपत्तिमत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
मामेवाभिमुखा वीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिताः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
मामेवाभिमुखाः सर्वे तिष्ठन्ति समरार्थिनः ||
१३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्पराय़णः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रिय़ोऽसि मे ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
मामय़ं धास्यतीत्येवं परिभाष्टः स वज्रिणा |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
मामय़ं प्राह वार्ष्णेय़ प्राञ्जलिर्नृपसत्तमः |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वचो युद्धाभिनन्दिनः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
मारीचः कश्यपस्तस्यामादित्यान्समजीजनत् |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
मारीचः कश्यपस्तात सर्वासामभवत्पतिः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मारीचश्चिन्तय़ामास विशिष्टान्मरणं वरम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मारीचस्त्वव्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
मारुतः सुरभिर्वाति मनोज्ञः सुखशीतलः ||
१२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
मारुतश्च ववौ युक्त्या पुण्यगन्धो विशां पते ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
मारुतागलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशालिनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
मारुतिं पञ्चविंशत्या भैमसेनिं च पञ्चभिः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
मारुते संनिवृत्ते च वलौ च प्रतिपादिते |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मारुतेन सुशीतेन सुखेनामृतगन्धिना |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
मारुतेनेव महता मेघानीकं विधूय़ता |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
मारुतेनैव चोद्धूतैर्मुक्ताविन्दुभिराचिताम् ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
मारुतो गन्धमादाय़ पाण्डवान्स्म निषेवते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
मारुतो वलवान्नित्यं यथैनं नारदोऽव्रवीत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
मारुतोद्धूतकेशान्तमुद्यतारिवराय़ुधम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
मारुतोद्धूतवेगस्य समुद्रस्येव पर्वणि |
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
मारुतोपहतच्छिद्रैः प्रविश्याग्निरिव द्रुमम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
मारुतौशनसे चैव व्रह्मलोकं च गच्छति ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
मार्कण्डेय़ इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़ं तपोवृद्धं दीर्घाय़ुषमकल्मषम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़ं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़ः पुरा प्राह इह लोकेषु वुद्धिमान् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़ः पुरा राजन्गङ्गाकूले कथान्तरे ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़मिदं वाक्यमव्रवीत्पाण्डुनन्दनः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़मुखात्कृत्स्नं यतिधर्ममवाप्तवान् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़वचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़श्च गोविन्दं कथय़त्यद्भुतं महत् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़श्च गोविन्दे कथय़त्यद्भुतं महत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
मार्कण्डेय़समस्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
मार्कण्डेय़समस्याय़ामुपाख्यानानि भागशः ||
१२४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
मार्कण्डेय़स्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् |
७० क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़स्य वदतस्तां कथामन्वमोदत ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़स्य वदतो ये दोषा मांसभक्षणे ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़ाच्छ्रुतवन्तः पुराणं; देवर्षीणां चरितं विस्तरेण ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़ादिभिर्विप्रैः पाण्डवैश्च महात्मभिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
मार्कण्डेय़ादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श ह ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
मार्कण्डेय़ान्मय़ा प्राप्तं निय़मेन जनार्दन |
१६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
मार्कण्डेय़ाय़ वार्ष्णेय़ नाचिकेतोऽभ्यभाषत ||
१६८ ख