उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
ऐकगुण्यमनीहाय़ामभावः कर्मणां फलम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति |
५ क
वन पर्व
अध्याय
८
कर्ण उवाच
ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्ष्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
ऐकात्म्यं नाम कश्चिद्धि कदाचिदभिपद्यते ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ऐकात्म्यं मां गतं विद्धि पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ||
१४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
ऐकात्म्यगमनात्सद्यः कल्मषाद्विप्रमुच्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ऐक्ष्वाकं पुरुषव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ||
१२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ऐक्ष्वाकी जनय़ामास सुहोत्रात्पृथिवीपतेः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
ऐडं च ये न खादन्ति तेषां जन्म निरर्थकम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
ऐडांश्चैलान्वार्षदंशाञ्जातरूपपरिष्कृतान् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
ऐडो मरुत्तः कुशिकः साङ्काश्यः साङ्कृतिर्भवः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२५१
द्रौपद्यु उवाच
ऐणेय़ान्पृषतान्न्यङ्कून्हरिणाञ्शरभाञ्शशान् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
ऐण्डिलः कुण्डलो मुण्डो वेणिस्कन्धः कुमारकः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
ऐन्द्रं नाराय़णं चैव यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्रं वाय़व्यमथ वारुणम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रं पाशुपतं व्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः |
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
ऐन्द्रं पाशुपतं व्राह्मं स्थूणाकर्णं च माधव |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
ऐन्द्रं याम्यं वारुणं वैत्तपाल्यं; मैत्रं त्वाष्ट्रं कर्म सौम्यं च तुभ्यम् ||
६७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह; यत्प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ऐन्द्रं वाय़व्यमाग्नेय़मस्त्रमस्त्रेण पाण्डवः |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
ऐन्द्रं स प्रार्थय़त्स्थानं विश्वरूपो महाद्युतिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ऐन्द्रं समाविशद्वज्रं लोकसंरक्षणे रतः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
ऐन्द्रद्युम्नेर्यज्ञदृशाविहावां; विवक्षू वै जनकेन्द्रं दिदृक्षू |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रमस्त्रं च वार्ष्णेय़ो योजय़ामास भारत |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रमस्त्रं विकुर्वाणमुभे चैवाग्निमारुते ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रमस्त्रममेय़ात्मा प्रादुश्चक्रे त्वरान्वितः |
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रमस्त्रममेय़ात्मा प्रादुश्चक्रे महारथः |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
ऐन्द्राग्नेन विधानेन दक्षिणामिति नः श्रुतम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ऐन्द्रास्त्रमर्जुनश्चापि तद्दृष्ट्वाभिन्यमन्त्रय़त् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन्सर्वलोकमहारथः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
ऐन्द्रीं तु दिशमास्थाय़ शैलराजस्य धीमतः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
ऐन्द्रे चन्द्रसमाय़ुक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
ऐन्द्रे जय़े धृतमना याम्ये कोपविधारणे |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ऐन्द्रेण तेनास्त्रवरेण राज; न्महाहवे भिन्नतनुत्रदेहाः ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
ऐन्द्रो धर्मः क्षत्रिय़ाणां व्राह्मणानामथाग्निकः |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ऐरावणकुले चैव तथान्येषु कुलेषु च |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ऐरावतं चतुर्दन्तं कैलासमिव शृङ्गिणम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
ऐरावतं समारुह्य द्विपेन्द्रं लक्षणैर्युतम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ऐरावतं समारुह्य स्वय़ं माय़ामय़ं कृतम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ऐरावतं समास्थाय़ शक्रश्चापि सुरैः सह |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ऐरावतः सानुचरः कलाः काष्ठास्तथैव च |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
ऐरावतकुलादेते प्रैविष्टा हव्यवाहनम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
ऐरावतकुले जातः सुमुखो नाम नागराट् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
ऐरावतकुलोत्पन्नः शीघ्रो भूत्वा तदा स वै |
२२ क