शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
वैशम्पाय़न उवाच
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
क इमे शेरते चेह पुरुषा देवरूपिणः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
क इवान्यो रणे कुर्यात्त्वदन्यः क्षत्रिय़ो युधि |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
क इवोत्सहते हन्तुं त्वां पुमान्भरतर्षभ ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
क इहान्यो भवेत्त्राणमभिधावेति चोदितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९
रुरुरु उवाच
क उपाय़ः कृतो देवैर्व्रूहि तत्त्वेन खेचर |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
क एताञ्जातु युध्येत लोकेऽस्मिन्वै जिजीविषुः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
क एष कौरवान्दीर्णानवस्थाप्य महारथः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
क एष दिवमाक्रम्य गतः सूर्य इवापरः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
युधिष्ठिर उवाच
क एष भगवन्दैत्यो महावीर्यस्तपोधन |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
क एष वेषप्रच्छन्नो भस्मनेव हुताशनः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
क एष हनुमान्नाम सागरो येन लङ्घितः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
कं च देशमधिष्ठाय़ तिष्ठत्यात्माय़मात्मनि ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
कं तु कर्मोदय़ं दृष्ट्वा तानर्चसि नराधिप ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
कं त्वद्य यजसे देवं पितरं कं न विद्महे ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
कं नु जह्यामहं पुत्रं कमादाय़ व्रजाम्यहम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
कं नु सेनाप्रणेतारं मन्यसे तदनन्तरम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
तक्षो उवाच
कं भवन्तमहं विद्यां घोरकर्माणमद्य वै |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
कं वा कर्मोदय़ं मत्वा तानर्चसि महामते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
कं वा कामं ददाम्यद्य व्रूहि यद्वत्स काङ्क्षसे |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
कं वा त्वं मन्यसे तेषां यस्त्वा व्रूय़ादतोऽन्यथा |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
कंसदासस्य दाय़ाद न ते लज्जास्त्यनेन वै |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
कंसभार्या जरासन्धं दुहिता मागधं नृपम् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कंसमेकं परित्यज्य कुलार्थे सर्वय़ादवाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रय़च्छति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
कः कुतन्तीं घट्टय़ति सुप्ते चण्डालपक्कणे |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
कः क्षत्रमवमन्येत चेतनावान्वहुश्रुतः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
कः क्षत्रिय़ो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम् ||
४२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कः क्षत्रिय़ो मन्यमानः सुप्तान्हन्यान्मृतानिव |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
कः पार्थ शोचेन्निरतः स्वधर्मे; पूर्वैः स्मृते पार्थिव शिष्टजुष्टे ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
कः पालय़ेदिति मुने तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
कः पिता जननी चास्य कतमस्यैष भोगिनः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
शक्र उवाच
कः पुनस्तव हेतुर्वै ईशे कारणकारणे |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
युधिष्ठिर उवाच
कः प्राप्तो विनय़ं वुद्ध्या मोक्षतत्त्वं वदस्व मे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
कः शिरस्यग्निमादाय़ विश्वस्तः स्वपते सुखम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवते |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
कः श्रमं राजशार्दूल नाशय़िष्यति मानद ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
कः स रामः कथं सीता जटाय़ुश्च कथं हतः |
५२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कः सहेत महावाहो वाह्वोर्निग्रहणं नरः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
कः स्विदुत्तरमेतस्माद्वक्तुमुत्सहते पुमान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
साध्या ऊचुः
कः स्विदेको रमते व्राह्मणानां; कः स्विदेको वहुभिर्जोषमास्ते |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
साध्या ऊचुः
कः स्विदेको वलवान्दुर्वलोऽपि; कः स्विदेषां कलहं नान्ववैति ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
ककुदं तस्य चाभाति स्कन्धमापूर्य विष्ठितम् |
१०९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
ककुदं सर्वभूतानां धनस्थो नात्र संशय़ः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
ककुदं सर्वय़ोधानां धाम सर्वधनुष्मताम् |
४ क