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शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
युधिष्ठिर उवाच
कथं च वालस्य सतः सूक्ष्मज्ञाने गता मतिः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कथं च वो रथस्थानां शरवर्षाणि मुञ्चताम् |
७५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
युधिष्ठिर उवाच
कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १०७
जनमेजय़ उवाच
कथं च शप्तस्य सतः पाण्डोस्तेन महात्मना |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कथं च शप्तो भ्राता मे तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ||
४३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
कथं च स महीपालो हतपुत्रो निराश्रय़ः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
जनमेजय़ उवाच
कथं च सदृशीं भार्यां गान्धारीं धर्मचारिणीम् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
भीष्म उवाच
कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
कथं च सात्यकिर्युद्धे व्यतिक्रान्तो महाय़शाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
कथं चलं वेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८४
तार्क्ष्य उवाच
कथं चाग्निं जुहुय़ां पूजय़े वा; कस्मिन्काले केन धर्मो न नश्येत् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं चातिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
कथं चानिन्द्रतां प्राप्तस्तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं चानुचरान्हित्वा शत्रुमध्ये पलाय़से ||
५८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
युधिष्ठिर उवाच
कथं चाप्युशना प्राप शुक्रत्वममरद्युतिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
युधिष्ठिर उवाच
कथं चारं प्रय़ुञ्जीत वर्णान्विश्वासय़ेत्कथम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कथं चास्य समुत्पत्तिर्यथा दैवं प्रवर्तते |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
कथं चेदं महत्कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भामिनि ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
जनमेजय़ उवाच
कथं चैकः स वैश्याय़ां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
युधिष्ठिर उवाच
कथं चैतत्समुत्पन्नं किमर्थं च प्रदीय़ते ||
१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
कथं चैतन्महाय़ुद्धं प्रावर्तत सुदारुणम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
युधिष्ठिर उवाच
कथं चैतां परां काष्ठां प्राप्तवानमितद्युतिः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेय़ुषः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
कथं चैषां तथा युद्धे धृतिरासीन्मुमूर्षताम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्यार्थाय़ च केन वा |
६ क
वन पर्व
अध्याय १२६
युधिष्ठिर उवाच
कथं जातो महाव्रह्मन्यौवनाश्वो नृपोत्तमः |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं जानीम भवतः क्षत्रिय़ान्व्राह्मणानुत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
कथं जीवति दुर्धर्षे त्वय़ि राधेय़ फल्गुनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
कथं जीवेय़ुरत्यन्तं कथं वर्धेय़ुरित्यपि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीय़ान्राज्यमर्हति |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कथं जय़ेम धर्मज्ञ कथं राज्यं लभेमहि |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
कथं जय़ेय़ं सङ्ग्रामे भवन्तमपराजितम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
कथं जय़ेय़ं सङ्ग्रामे भवन्तमपराजितम् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
कथं तत्किल्विषं कृत्वा निर्भय़ा व्रूहि मामकाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५
शौनक उवाच
कथं तदमृतं देवैर्मथितं क्व च शंस मे |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
यय़ातिरु उवाच
कथं तदल्पकालेन क्षीणं येनास्मि पातितः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं तन्न मृषेह स्याद्धर्मराजवचः शुभम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
कथं तव कुलस्यैकामिमां वालामसंस्कृताम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
कथं तस्मात्समुत्पन्नस्तन्निष्ठस्तदुपाश्रय़ः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ८५
अष्टक उवाच
कथं तस्मिन्क्षीणपुण्या भवन्ति; संमुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
कथं तस्य कुले जातः कुलभेदं व्यवस्यसि |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
कथं तस्य रणे वेगं मानुषः प्रसहिष्यति ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
कथं तान्संय़ुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
कथं तु पिण्डसञ्ज्ञां ते पितरो लेभिरे पुरा ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ११
विराट उवाच
कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने; वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं तु शतधा नेदं हृदय़ं मम दीर्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
कथं ते जातु शोचेय़ुर्ध्याय़ेय़ुर्वाप्यशोभनम् ||
४२ ख