chevron_left  कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्arrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४९
व्राह्मण उवाच
कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कदाचन |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कुर्याम तद्वय़ं कर्म क्रिय़ासुः सुहृदश्च नः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
कुर्यामपूर्वं न कृतं यदन्यै; र्विवित्समानः किमु तत्र साधु |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
कुर्यामस्ते जिताः कर्म स्वय़मात्मन्युपप्लवे ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
कुर्यास्तथा त्वं कल्याणि यथा संनिहितो भवेत् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
कुर्युरेते क्वचिच्छेषं न तु क्रुद्धो धनञ्जय़ः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
कुर्युर्दोषमदोषस्य वृहस्पतिमतेरपि ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
कुर्यू राजानमेवाग्रे प्रजानुग्रहकारणात् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
कुर्वतः पार्थ विपुलान्वन्याश्रमपदं भवेत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
कुर्वतः शपथं तं वै यः कृतो मिथुनेन वै |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद्विषहेत मे ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
कुर्वता तस्य संमानं त्वां च जिज्ञासता मय़ा |
६२ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपतेः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
कुर्वतां यज्ञ इत्येव न यज्ञो जातु नेष्यते ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वतां शौचकर्माणि भीष्मस्य निधने तदा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
कुर्वती द्विजमुख्यानां तं तं देशं जगाम ह ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
कुर्वते च वहून्मार्गांस्तांस्तान्हेतुवलाश्रिताः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
कुर्वते जीवतोऽप्येवं मृते नैवास्ति संशय़ः ||
४९ ग
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
कुर्वते तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कुर्वतो हि भवत्येव प्राय़ेणेह युधिष्ठिर |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
कुर्वतोर्विविधा माय़ाः शक्रशम्वरय़ोरिव ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्तः शासनं तस्य पाण्डवेय़ा यशस्विनः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्तमृषभस्कन्धं कुरुवृष्णिय़शस्करम् ||
६९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्तस्तव पुत्रस्य शासनं युद्धदुर्मदाः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि विहरिष्याम भारत ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
कुर्वन्ति तेषां कर्माणि येषां नास्ति फलोदय़ः ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
कुर्वन्ति दुर्वुधा वासं मुच्यन्ते तत्र पण्डिताः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
कुर्वन्ति धर्मं मनुजाः श्रुतिप्रामाण्यदर्शनात् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
कुर्वन्ति पुरुषाः कर्म फलमीश्वरगामि तत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
कुर्वन्ति भक्तिमिष्टां च जानीषे त्वं च भास्कर ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्ति भेषजं प्राज्ञाः सत्यं तच्चापि दृश्यते |
८४ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
कुर्वन्तीं प्रभय़ा देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वन्तु शान्तिकां त्वद्य रणे योऽय़ं मय़ा हतः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं; पाञ्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्तो विविधान्नादान्वज्रनुन्ना इवाचलाः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
कुर्वन्त्यतिथिपूजार्थं यज्ञतन्त्रार्थसिद्धय़े ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
कुर्वन्त्या तु तय़ा तत्र मण्डलं तत्प्रदक्षिणम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वन्नपि तथैव स्यात्कृत्वा च निरपत्रपः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कुर्वन्नार्तस्वरं घोरं धिग्धिग्भीमेत्युवाच ह ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कुर्वन्निःशर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कुर्वन्भवच्छासनमाशु यातो; ह्यहं विशालां रुचिरप्रभावाम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
कुर्वन्रथान्विपुरुषान्विध्वजान्भग्नपुष्करान् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
कुर्वन्वसति सर्वेषु ह्याश्रमेषु युधिष्ठिर ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
कुर्वन्सुतुमुलं युद्धं पक्षिराण्न व्यकम्पत ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ||
५ ख