सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुभूय़ तु राज्ञस्तं राजसूय़ं महाक्रतुम् |
१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुभूय़ पूर्वं त्वं कृच्छ्रमितः प्रभृति कौरव |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
अनुभूय़ भृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
अनुभूय़तामय़ं वीराः स्वय़ंवर इति प्रभो ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
अनुभूय़ेह भद्राणि प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अनुभूय़ेह भद्राणि प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
अनुभूय़ेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीय़ते ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
अनुभूय़ोत्सवं चैव गमिष्यामो यथेप्सितम् ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
अनुमन्यस्व तत्सर्वं मा च शोके मनः कृथाः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुमन्यस्व मां व्रह्मन्सहस्रं परिवत्सरान् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
अनुमानाच्च पश्यामि नास्ति सञ्जय़ सैन्धवः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवय़वैः सह ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
अनुमानाद्विजानीमः पुरुषं सत्त्वसंश्रय़म् |
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अनुमानेन युध्यन्ते सञ्ज्ञाभिश्च परस्परम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
अनुमानेन सञ्ज्ञाभिर्नामगोत्रैश्च संय़ुगे |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अनुमानेन सञ्ज्ञाभिर्युद्धं तत्समवर्तत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
अनुमानेन सञ्ज्ञाभिर्युद्धं तद्ववृते महत् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य कृपं राजा प्रय़यौ येन मद्रराट् ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अनुमान्य गुरून्सर्वान्पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य गुरून्सर्वान्योत्स्यते पार्थिवोऽरिभिः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य च गाङ्गेय़ं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य तमाचार्यं प्राय़ाच्छारद्वतं प्रति ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य महात्मानं भरतानाममध्यमम् |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुमान्य महाराजं तत्सदः सम्प्रभाष्य च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुमान्य महावाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य यथाशास्त्रं यस्तु युध्येन्महत्तरैः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य रणे भीष्मं शस्त्रं न्यासय़ भारत ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्य रणे भीष्ममितोऽहं द्विपदां वरम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अनुमान्यः प्रसाद्यश्च गुरुः क्रुद्धो युधिष्ठिर ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमान्याथ कौन्तेय़ो मातुलं मद्रकेश्वरम् |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमानय़े त्वां योत्स्यामि गुरो विगतकल्मषः |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अनुमानय़े त्वां योत्स्यामि गुरो विगतकल्मषः |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुरक्तश्च तानासीत्पाण्डवान्स घटोत्कचः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
अनुरक्तश्च शूरश्च रथोऽय़मपरो महान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अनुरक्ता हिता चैव स्निग्धा चैव पतिव्रता |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
भीष्म उवाच
अनुरक्तेन पुष्टेन हृष्टेन जगतीपते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
अनुरक्तो ह्यसंहार्यः पार्थान्प्रति जनार्दनः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
अनुरज्यन्ति भूतानि समर्यादेषु दस्युषु ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
अनुराधां प्रार्थय़ते मैत्रं संशमय़न्निव ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
अनुराधासु कुर्वाणो राजचक्रं प्रवर्तय़ेत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
अनुराधासु प्रावारं वस्त्रान्तरमुपोषितः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुरुध्य महाप्राज्ञो भ्रातुश्चित्तमरिन्दमः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
अनुरुन्ध्याद्वहुज्ञांश्च सारज्ञांश्चैव पण्डितान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
अनुरूपं कुरुश्रेष्ठ त्वय़्येतत्पृथिवीपते |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुरूपं कुलस्यास्य सन्तत्याः प्रसवस्य च ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुरूपं ततो राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
अनुरूपं महावाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
अनुरूपं यदत्राद्य तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
६५ ख