आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
कुवेरः सर्वय़क्षाणां देवतानां पुरन्दरः |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरकान्तं भरतर्षभाणां; महीधरं वारिधरप्रकाशम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरकान्तां नलिनीं विशोकाः; सम्पश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कुवेरद्रोणय़ोश्चैव कृपस्य च महात्मनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
कुवेरनलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरभवनाद्राजन्नाजगाम गणावृतः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरे |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
कुवेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामराः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कुवेरवैवस्वतवासवानां; तुल्यप्रभावाम्वुपतेश्च वीराः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
कुवेरसचिवाश्चान्ये रौद्रा मैत्राश्च राक्षसाः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरसदनं दृष्ट्वा राक्षसांश्च निपातितान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
कुवेरसदनं प्राप्य ततो रत्नान्यवाप्य च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुवेरस्तत्प्रसादार्थं यतते स्म सदा नृप ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरस्तु महासत्त्वान्पाण्डोः पुत्रान्महारथान् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
कुवेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरेण यथा हीनं वनं चैत्ररथं तथा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
कुव्जभावं च जरय़ा यः पश्यति स मुच्यते ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुव्जाश्च दीर्घजङ्घाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
कुशकण्टकविद्धाङ्गावुन्मत्ताविव धावतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
कुशचीराम्वरधरः परं निय़ममास्थितः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
कुशद्वीपे कुशस्तम्वो मध्ये जनपदस्य ह |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्चितः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
कुशप्लवनमासाद्य व्रह्मचारी समाहितः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
कुशलं चापि पृच्छेत यद्यप्यकुशलं भवेत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
कुशलं चाव्ययं चैव पृष्ट्वा वैय़ासकिं नृपः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
कुशलं चाव्ययं चैव सर्वस्य जगतस्तथा ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलं चाव्रुवन्सर्वे त्वां युय़ुत्सुमिहागतम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
कुशलं तु कुतस्तस्य यस्येय़ं जननी पितः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामय़ाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलं त्वां महाप्राज्ञः सर्वतः परिपृच्छति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
कुशलं त्वाव्रवीद्रामः सीते सौमित्रिणा सह |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
कुशलं नो गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामय़म् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलं पाण्डुपुत्राणामपृच्छन्मधुसूदनम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
जय़द्रथ उवाच
कुशलं प्रातराशस्य सर्वा मेऽपचितिः कृता |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलं राजशार्दूल कच्चित्ते कुरुनन्दन |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कुशलं वो महाभागाः स्वधर्मचरणेषु च ||
६६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
कुशलं व्राह्मणान्पृच्छेरावय़ोर्वचनाद्भृशम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
कुशलं सह दानाय़ तस्मै यस्य प्रजा इमाः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्युपसेवते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
कुशलः सुखदुःखेषु स वै सर्वधनेश्वरः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
कुशलप्रश्नमकरोत्सर्वेषां राजसत्तमः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ च तत्र प्रचक्रतुः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
कुशलप्रश्नसंय़ुक्तं कुशलो वाक्यकर्मणि ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
कुशला अपि राजेन्द्र नरा नगरवासिनः ||
१३ ख