अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
कूपः प्रवृत्तपानीय़ः सुप्रवृत्तश्च नित्यशः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
कूपवीनाहवेलाय़ामपश्यत महागजम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
कूपा इव तृणच्छन्ना विशुद्धा द्यौरिवापरे ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
कूपाधस्ताच्च नागेन वीनाहे कुञ्जरेण च ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
कूपारामसभावाप्यो व्राह्मणावसथास्तथा |
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
जनमेजय़ उवाच
कूपे कथं च हित्वैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कूपे च वसता तेन सोमः पीतो महात्मना ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
कूपे वा सलिलं दद्यात्प्रदीपं वा हुताशने |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
कूपेऽऽत्मानमधःशीर्षमपश्यं पतितं च ह |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च शशोलूकमुखास्तथा |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कूर्मग्राहझषाकीर्णां पुलिनद्वीपशोभिताम् ||
१०८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
कूर्मनक्रमुखाश्चैव शिशुमारमुखास्तथा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
कूर्मपृष्ठसमा भूमिर्भवत्यथ समन्ततः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कूर्मरूपेण राजेन्द्र असुरेण दुरात्मना |
१०४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
कूर्मश्च कुलिकश्चैव काद्रवेय़ा महावलाः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
कूर्मस्त्रिय़ोजनोत्सेधो दशय़ोजनमण्डलः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
कूर्मान्कर्कटकान्नक्रान्मकराञ्शिंशुकानपि |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धाय़ाभ्येति वीर्यवान् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कूलहारी कूलकर्ता वहुविद्यो वहुप्रदः ||
१०६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
कूलापहारमकरोत्स्वेन वेगेन सा सरित् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
कूवरं रथचक्राणि ईषा योक्त्राणि चाभिभो |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
कूवराणां वरूथानां पृषत्कानां च संय़ुगे ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
कूवरैर्मथितैश्चापि ध्वजैश्चापि निपातितैः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
कूष्माण्डजात्यलावुं च कृष्णं लवणमेव च ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कृकलासमुखाश्चैव विरजोम्वरधारिणः ||
८१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो जितोऽय़ं तव कर्मणा ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
कृच्छ्रप्राणोऽभवद्यत्र लोकोऽय़ं वै क्षुधान्वितः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
कृच्छ्रप्राप्तं रथचक्रे निमग्ने; हन्याः पूर्वं त्वं तु सञ्ज्ञां विचार्य ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं न्वहम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रां योनिमनुप्राप्य न सुखं विन्दते जनाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्राच्च द्रव्यसंहारं कुर्वन्ति धनकारणात् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्राज्जग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पय़ा ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
कृच्छ्रात्स विषमाच्चैव विप्र मोक्षमवाप्नुते ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
कृच्छ्रात्समुद्वहन्वीर न्यग्रोधं समुपागमत् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रात्स्वशिविरं प्राय़ाद्धतशेषैर्नृपैः सह ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रादिव महावाहुरनुमन्ये विनिःश्वसन् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव ||
१२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्राद्द्रविणभारार्ता हर्षय़न्ती कुरूद्वहान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
कृच्छ्राद्द्वादशरात्रेण स्वभ्यस्तेन दशावरम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
अत्रिरु उवाच
कृच्छ्राधीतं प्रनष्टं च तेन पीवाञ्शुनःसखः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
कृच्छ्रान्दुर्योधनो लोकान्पापः प्राप्स्यति दुर्मतिः |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
कृच्छ्रामापदमापन्नान्प्रिय़ं किं करवाणि वः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
कृच्छ्रामापेदिरे वृत्तिमन्नहेतोस्तपस्विनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
कृच्छ्राल्लव्धमभिप्रेतं यदा कौसल्य नश्यति |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
कृच्छ्रास्वापत्सु संमूढान्गणानुत्तारय़न्ति ते ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
कृच्छ्रे द्वादशरात्रे तु तस्य राज्ञः समापिते |
८ क