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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कृतं सर्वत्र लभते नाकृतं भुज्यते क्वचित् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
कृतं सर्वेण भद्रं ते जप्यं यद्याचितं मय़ा |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १२६
कर्ण उवाच
कृतं सर्वेण मेऽन्येन सखित्वं च त्वय़ा वृणे |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
कृतं स्वर्गेण मे कार्यं गच्छ स्वर्ग यथासुखम् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
कृतं हि तत्कृतेनैव कर्ता तस्यापि चापरः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
कृतं हि तव पुत्रैश्च परेषामवरोधनम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं हि व्यक्तमाग्नेय़मिदं वेश्म परन्तप |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
कृतः पुरुषकारः सन्सोऽपि दैवेन सिध्यति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कृतः पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
कृतः पुरुषकारोऽपि भवेद्येषु निरर्थकः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
कृतः पुष्पमय़ो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
व्राह्मण उवाच
कृतः प्रय़त्नः सुमहान्सर्वेषां संनिधाविह |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
कृतः सेनापतिस्त्वेष त्वय़ा भीष्मो नराधिप |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १४२
अर्जुन उवाच
कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय़ ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
कृतकामाः प्रसन्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ||
१२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
कृतकाराः सुवलय़स्ततो द्वारमवाप्स्यथ ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजय़ाजय़ ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
कृतकार्यः सुखी शान्तस्तूष्णीं प्राय़ादुदङ्मुखः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
कृतकार्यमिवात्मानं मन्यमानोऽव्रवीन्नृपम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
कृतकार्या ततस्तूर्णमगच्छच्छक्रसंसदम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतकार्येण भवता ममैव निर्यात्यौ क्षिप्रमिति ||
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
कृतकिल्विषाः पाण्डवेय़ैर्धार्तराष्ट्रा मनस्विनः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
भीष्म उवाच
कृतकृत्य उपातिष्ठत्सिद्धं तमतिथिं तदा ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
कृतकृत्यं तदात्मानं स राजा अभ्यनन्दत ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कृतकृत्यः सुखी चैव भविष्यामि महामते ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतकृत्यश्च कौरव्य विधत्स्व यदनन्तरम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वासुदेव उवाच
कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
कृतकृत्यस्य चारण्ये वासो विप्रस्य शस्यते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
कृतकृत्या तु विनता लव्ध्वा वीर्याधिकौ सुतौ |
१० क
विराट पर्व
अध्याय २३
सैरन्ध्र्यु उवाच
कृतकृत्या भविष्यन्ति गन्धर्वास्ते न संशय़ः ||
२७ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कृतकृत्यांश्च वो मन्ये संसिद्धान्कुरुपुङ्गव |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
कृतकृत्याः पुनर्वर्णा यदि वृत्तं न विद्यते |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
कृतकृत्याः सुखं हृष्टाः प्रातिष्ठन्त तदा विभो ||
१११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
कृतकृत्याः स्म साय़ाह्ने निवासं रोचय़ामहे |
६३ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कृतकृत्यानि चास्त्राणि गतान्यद्य यथागतम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
कृतकृत्यो भवेद्राजन्नश्वमेधं च विन्दति ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं त्यजति वै सह ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
कृतकृत्यो वय़ोतीतो राज्ञः कृतपरिश्रमः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
कृतकृत्योऽनृणश्चासि मा भैर्युध्यस्व पाण्डवम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतकृत्योऽभवद्राजा प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्राय़ोपवर्णितम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
कृतकौतूहलस्तेषु मुक्तश्चर यथासुखम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
कृतक्षण एवास्मि |
१२४ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतघ्नं तमहं मन्ये वानरापसदं भुवि |
८ क