chevron_left  कृतमन्यैरपहृतंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
कृतमन्वेति कर्तारं पुरा कर्म द्विजोत्तम ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
कृतमस्या भवेत्कार्यं कन्याय़ा भृगुनन्दन |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
कृतमादिर्युगानां च सर्वेषां नात्र संशय़ः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
कृतमानोपकारं च यशस्वि च मनस्वि च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमित्यव्रवीच्छल्यः किमन्यत्क्रिय़तामिति |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमित्येव गान्धारिः प्रत्युवाच पुनः पुनः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमित्येव तज्ज्ञेय़ं नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
कृतमित्येव तत्कार्यं मेनिरे रूपसम्पदा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
कृतमित्येव तत्सर्वं कृत्वा तिष्ठेत पार्श्वतः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतमित्येव तद्विद्धि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विजः |
४० क
वन पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमित्येव मन्येऽहं प्रसादात्तव सुव्रत ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
कृतमित्येव मन्येऽहं यदहं दृष्टवान्प्रभुम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
कृतमित्राः कृतवला धार्तराष्ट्राः परन्तप ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
कृतमुद्धर्षणं पूर्वं मय़ा वः सीदतां नृप ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
कृतमूलमिदानीं तज्जातशव्दं सहाय़वत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कृतमेतदनाहार्यं तव पुत्रेण पार्थिव ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमेव च तत्सर्वं पृथा तस्मै न्यवेदय़त् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २११
अर्जुन उवाच
कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद्ध्रुवम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमेव त्वय़ा सर्वं मम वानरपुङ्गव |
११ क
सभा पर्व
अध्याय १
अर्जुन उवाच
कृतमेव त्वय़ा सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर |
३ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन्काले युगोत्तमे ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतमेव महाराज भवेदिति मतिर्मम ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १२७
सोमक उवाच
कृतमेव हि तद्विद्धि भगवान्प्रव्रवीतु मे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
कृतमेवाकृताच्छ्रेय़ो न पापीय़ोऽस्त्यकर्मणः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
व्रह्महत्यो उवाच
कृतमेवेह मन्येऽहं निवासं तु विधत्स्व मे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
कृतम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
गुरुरु उवाच
कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकानवाप्नुवन् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
कृतवर्त्मा त्वमेवाद्रिर्वृषगर्भो वृषाकपिः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् |
४३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतवर्मणा नृशंसेन गौतमेन कृपेण च |
३ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
कृतवर्मा अनाधृष्टिः समीकः समितिञ्जय़ः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृतास्त्रेण धरणीमन्वपद्यत ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
धृतराष्ट्र उवाच
कृतवर्मा कृपश्चैव द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः ||
१०० ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृपश्चैव सङ्क्रुद्धावभ्यधावताम् ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः साय़ाह्ने रुधिरोक्षिताः ||
१७९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः सूतपुत्रश्च मारिष |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा कृपो द्रौणी राजानमिदमव्रुवन् ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा च वलवानुत्तमौजसमाद्रवत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा च शैनेय़ं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
कृतवर्मा च सौभद्रं षड्रथाः पर्यवारय़न् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
दुर्योधन उवाच
कृतवर्मा च हार्दिक्यः काम्वोजश्च सुदक्षिणः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
कृतवर्मा च हार्दिक्यः पृथुर्विपृथुरेव च ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा च हार्दिक्यः षड्रथाः पर्यवारय़न् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा च हार्दिक्यः षड्रथाः पर्यवारय़न् ||
४ ख