chevron_left  कृतवान्यादृगद्यैकस्तवarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कृतवान्यादृगद्यैकस्तव पुत्रो महारथः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
कृतवान्यानि गोविन्दो यथा नान्यः पुमान्क्वचित् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
कृतवान्यानि युद्धानि कर्णः पाण्डुसुतैः सह |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
कृतवान्यो महीपाल किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१२८ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतवान्राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
धृतराष्ट्र उवाच
कृतवान्रौहिणेय़ो यत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतवान्हि दय़ां नित्यं तस्य कार्यं हितं मय़ा ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
कृतवीर्य इति ख्यातो वभूव नृपतिः क्षितौ |
११ क
सभा पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्यः किं करिष्यति |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
कृतवुद्धिर्वने तस्मिन्वस्तुं तां रजनीं तदा ||
२५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
कृतवैरः पुरा चैव सहदेवेन पार्थिवः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
कृतवैरश्च पार्थेन तस्मादेनं रणे जहि ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृतवैरावुभौ वीरौ यमावपि यमोपमौ ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
कृतवैराश्च पार्थेन विराटनगरे तदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कृतवैरे न विश्वासः कार्यस्त्विह सुहृद्यपि |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
कृतवैरौ तु तौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
कृतशुद्धशरीरो हि पात्रं भवति व्राह्मणः ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतशौचं ततो वृद्धं श्वशुरं कुन्तिभोजजा |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतशौचं पुनश्चैनं प्रोवाच मधुसूदनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान्भरतर्षभान् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कृतशौचौ नरव्याघ्रौ प्रीतिमन्तौ वभूवतुः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतश्च समय़स्तेन पार्थेनामिततेजसा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
कृतश्रमः कृतप्रज्ञो न च तृप्तः समाधितः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कृतसङ्कल्पमाय़स्तं वधे कर्णस्य सर्वशः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतसम्प्रत्ययस्तत्र कीचकः काममोहितः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
कृतसर्वस्वहरणा निर्दोषाः प्रभविष्णुभिः |
५७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
कृतस्तस्यैष संमानः पाञ्चालान्रक्षता मय़ा |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कृतस्य करणाद्राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत्फलं दिवि |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
कृतस्य कारणाद्राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
कृतस्य चैव कर्तुश्च सख्यं सन्धीय़ते पुनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
कृतस्य पूर्वं चानर्थैर्युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुषैः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे संस्तूय़न्तश्च वन्दिभिः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतस्वस्त्ययनो विद्वान्व्राह्मणेन यशस्विना |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः कवची समलङ्कृतः |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय ४४
शकुनिरु उवाच
कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
कृता विसञ्ज्ञा भूय़िष्ठाः क्लान्तवाहनसैनिकाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति तेऽस्तु विशां पते |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
कृतां राज्यप्रदानेन प्रतिज्ञां परिपालय़न् ||
६७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
कृतां विन्दुसरोरत्नैर्मय़ेन स्फाटिकच्छदाम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
कृताः करप्रदाः सर्वे राजानस्ते नराधिप ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
कृताकृतपरिज्ञाने तथाय़व्ययचिन्तने |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
कृताकृतपरिज्ञाने भीष्मद्रोणौ महामती ||
५ ख