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वन पर्व
अध्याय २८९
कुन्त्यु उवाच
कृतानि मम सर्वाणि यस्या मे वेदवित्तम |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
कृतानि सर्वकार्याणि यस्य वा पार्षदा विदुः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
कृतान्त इव रौद्रात्मा भीमसेनो व्यदृश्यत ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
कृतान्तं नातिचक्राम वेलामिव महोदधिः ||
८ ख
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कृतान्तमन्यथा नैच्छत्कर्तुं स जगतः प्रभुः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
कृतान्तवश्यानि यदा सुखानि; दुःखानि वा यन्न विधर्षय़न्ति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
कृतान्तविधिसंय़ुक्तं सर्वलोकः प्रपद्यते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतान्तविधिसंय़ुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतान्तविधिसंय़ुक्ताः कालेन निधनं गताः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
कृतान्तविहिते मार्गे को मृतं जीवय़िष्यति ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतान्तस्य हि भूतेन स्थावरेण त्रसेन च ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
कृतापदानं च तदा वलमासीन्महाभुज ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कृताभिषेकाः शुचय़ः कृतजप्या हुताग्नय़ः |
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृताभिषेकैर्मुनिभिर्हुताग्निभिरुपस्थिताः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्निय़तैः सत्पथि स्थितैः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
कृताभिसमय़ाः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
कृतामन्याय़तो दृष्ट्वा ततस्तमृषिरव्रवीत् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं चाकृतार्थं च त्वां वय़ं मधुसूदन |
२० क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमात्मना |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं मन्यते वाल आत्मानमविचक्षणः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं मन्यते वालः सोऽऽत्मानमविचक्षणः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं मन्यतेऽऽत्मानं तथा सर्वेऽपि कौरवाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थं मां सहामात्यस्त्वमर्चिष्यसि भारत ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामः पुनरागतम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम् ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कृतार्थः सफलः पार्थ सुखी भव नरोत्तम ||
११० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदितः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्थमिव चात्मानं स मेने पूर्णमानसः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतार्था भुञ्जते दूताः पूजां गृह्णन्ति चैव हि |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
कृतार्थाः सुभृता ये हि कृत्यकाल उपस्थिते |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतार्थानां हि भृत्यानामेतद्भवति चेष्टितम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
कृतार्थो भोगतो भूत्वा स वै रतिपराय़णः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
कृतार्थो यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्च यः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
कृतार्थो वा भविष्यामि हत्वा तावथ वा हतः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रिय़म् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
कृताशं कृतनिर्वेशं कृतभक्तं कृतश्रमम् |
६८ क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
कृतास्त्रं निपुणं युद्धे प्रतिमानं धनुष्मताम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रं ह्यर्जुनं प्राप्य भीमं च कृतनिश्रमम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
गङ्गो उवाच
कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रपरमाः शल्ये दुःखपारं तितीर्षवः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
कृतास्त्रमभिविश्वस्तमथ मां हरिवाहनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
कृतास्त्रा रणदीक्षाभिर्दीक्षिताः शरधारिणः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
कृतास्त्रा वहवो जघ्नुर्व्रूहि गावल्गणे कथम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्राः क्षिप्रमस्यन्तस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रान्धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रैः क्षिप्रमस्यद्भिर्दूरपातिभिराय़साः |
११ क