chevron_left  कृतास्त्रैस्तत्प्रदेय़ंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रैस्तत्प्रदेय़ं मे तदृतं वदतानघाः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
कृतास्त्रैस्तत्प्रदेय़ं स्यात्तदृतं वदतानघाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
कृतास्त्रो ह्यकृतास्त्रो वा वृद्धो वा यदि वा युवा ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रौ निशितैर्वाणैरसिशक्तिगदाभृतौ ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
कृताहारं कृताहाराः सर्वे ते विदुरादय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
कृताहारौ सुतुष्टौ तावुपविष्टौ वरासने |
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृताह्निकं च राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
कृताह्निकाय़ पार्थाय़ न्यवेदय़त तं रथम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कृतिनं तं दुराधर्षं सम्यग्यास्यन्तमन्तिके |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
कृतिना समरे राजन्सन्धिस्ते तात युज्यताम् ||
४० ग
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
कृतिनौ समरे तात दृढवीर्यपराक्रमौ ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
कृतिर्विकारः प्रलय़ः प्रधानं प्रभवोऽव्ययः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कृती च चित्रय़ोधी च देशे काले च कोविदः ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
कृती च चित्रय़ोधी च संय़ुक्तो लाघवेन च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
कृती च वलवांश्चैव युद्धशौण्डश्च नित्यदा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
कृती च सततं पार्थ नित्यं द्वेष्टि च पाण्डवान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
कृती चामोघकर्तासि भाव्यैश्च समलङ्कृतः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
कृती तु राजा कौरव्य शूकराणां विशां पते |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यविक्षतः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कृते कर्मणि राजेन्द्र तथानृण्यमवाप्यते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
कृते कर्मणि राजेन्द्र पूजय़ेद्धनसञ्चय़ैः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
कृते कर्मण्यमोघानां कर्ता भृत्यजनप्रिय़ः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
कृते क्षत्रविनाशाय़ धनुराय़च्छदर्जुनः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
कृते च तस्मिन्भविता तवापि सुमहान्गुणः ||
४६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
कृते च मोघसङ्कल्पे द्रोणपुत्रे महारथे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
कृते चतुष्पात्सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २०४
वैशम्पाय़न उवाच
कृते तु समय़े तस्मिन्पाण्डवैर्धर्मचारिभिः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
कृते त्रेतादिष्वेतेषां पादशो ह्रसते वय़ः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
कृते त्रेताय़ुगे चैव द्वापरे च कलौ तथा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
कृते दैवे च पित्र्ये च ततस्ताभ्यां निरीक्षितः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
कृते धर्मे भवेत्कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
कृते पुरुषकारे च येषां कार्यं न सिध्यति |
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
कृते पुरुषकारे तु नैनः स्पृशति पार्थिवम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
कृते प्रतिकरिष्यन्तः केशवस्यार्जुनस्य च ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य वाहुवलं च मे |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कृते प्रतिकृतं पश्य हतपुत्रा हि पाण्डवाः |
५० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
कृते याचामि वः सर्वान्गान्धारीसहितोऽनघाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
कृते युगे चतुष्पादश्चातुर्वर्ण्यस्य शाश्वतः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
कृते युगे धर्म आसीत्समग्र; स्त्रेताकाले ज्ञानमनुप्रपन्नः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
कृते युगे महाराज पुरा स्वाय़म्भुवेऽन्तरे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
कृते युगे यस्तु धर्मो व्राह्मणेषु प्रदृश्यते |
६७ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
कृते युगे समभवन्स्वकर्मनिरताः प्रजाः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
कृते रणे कथं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
कृते विमर्दे लङ्काय़ां लव्धलक्षो जय़ोत्तरः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
कृते विवाहे च ततः स्म पाण्डवाः; प्रभूतरत्नामुपलभ्य तां श्रिय़म् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
कृते विवाहे तु तदा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ; महारथेभ्यो वहुरूपमुत्तमम् |
१५ क