शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
कथं धर्मच्छले नास्मिन्निमज्जेय़मसाधुवत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्राह्मण उवाच
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन्नरो वर्तेत भारत |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
युधिष्ठिर उवाच
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन्राजा वर्तेत धार्मिकः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
कथं न ज्ञेय़मस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
कथं न प्रत्युदेत्यद्य स्मय़माना यथा पुरा ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं न भिद्येत न च स्रवेत; न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम् |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
कथं न युध्येय़महं कुरून्सर्वान्स्थिरो भव ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
कथं न राजवंशोऽय़ं नश्येत्प्राप्य सुतान्मम |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
कथं न लिप्येय़महं दोषेण महताद्य वै ||
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
कथं न वध्यतां तात गच्छेम जगतस्तथा ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
कथं न वासुदेवोऽय़मर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
कथं न विप्रणश्येम योनितोऽस्या इति प्रभो |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
सगर उवाच
कथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
कथं न सर्वानहितान्रणेऽवधी; न्महास्त्रविद्व्राह्मणपुङ्गवो गुरुः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
शार्ङ्गका ऊचुः
कथं न स्यात्पिता मोघः कथं माता ध्रिय़ेत नः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं न स्युरिमा गाव आवाभ्यां वै विना त्रितम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
कथं नस्तारय़ेद्दुःखात्स त्वं तारय़ वान्धवान् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
जनमेजय़ उवाच
कथं नागाय़ुतप्राणो भीमसेनो महावलः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
कथं नागाय़ुतप्राणो वाहुशाली वृकोदरः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कथं नाम कुले जातः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
कथं नाम भवेत्कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कथं नाम भवेदेतद्यदि त्वं पार्थ धर्मजम् |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नाम भवेद्द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नाम विपर्यासाद्धुन्धुमारत्वमागतः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपतिः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
कथं नाय़ं राक्षसः कूटय़ोधी; हन्यात्कर्णं समरेऽदृश्यमानः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
जनमेजय़ उवाच
कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
युधिष्ठिर उवाच
कथं निर्वेदमापन्नः शुको वैय़ासकिः पुरा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तवुद्धय़ः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
युधिष्ठिर उवाच
कथं निवृत्तो भगवांस्तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तय़न् |
३७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु क्षत्रिय़ः पार्थः शक्रासनमवाप्तवान् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरः सदा |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
कथं नु खलु सम्भावय़ेय़मिति ||
१६० 5
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
कथं नु जीवितं श्रेय़ो मम पश्यसि भारत ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
कथं नु तस्य सङ्ग्रामे पृथिवी चक्रमग्रसत् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु तस्यानाथाय़ा मद्विनाशाद्भुजङ्गम |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं नु तावय़ुध्येतां सूतपुत्रवृकोदरौ ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
कथं नु ते सखी दासी कन्येय़ं वरवर्णिनी |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
कथं नु त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
कथं नु त्वां सूतपुत्रः किरीटि; न्महेषुभिर्दशभिरविध्यदग्रे ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
कथं नु दृष्ट्वा पाञ्चालीं तथा क्लिष्टां सभागताम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु देवा हविषा गय़ेन परितर्पिताः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
कथं नु देवाञ्जानीय़ां कथं विद्यां नलं नृपम् ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
कथं नु धर्मं धर्मज्ञैः समुद्दिष्टं महात्मभिः |
१९ क