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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
कृत्स्नमेतावतस्तात क्षरते व्यक्तसञ्ज्ञकम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
कृत्स्नमेते विनिक्षिप्ताः प्रतिरूपेषु कर्मसु |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
कृत्स्नस्तु मन्त्रो विधिवत्प्रय़ुक्तो; यज्ञा यथोक्तास्त्वथ दक्षिणाश्च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्स्नस्य चैव जगतस्तिष्ठन्त्यनपगाः सदा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
कृत्स्ना मार्गगुणाश्चैव तथा भूमिगुणाश्च ह |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
कृत्स्ना वसुमती राजन्वशे ते स्यान्न संशय़ः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
कृत्स्ना ह्यक्षौहिणी राजन्सव्यसाची च पाण्डवः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
कृत्स्नां च वुद्धिं सम्प्रेक्ष्य सम्पृच्छे त्रिदिवङ्गम ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्स्नान्सर्वानभिप्राय़ान्प्राप्स्यामः सर्वराजसु ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्स्नान्हि विविधान्धर्मांश्चातुर्वर्ण्यस्य वेत्त्ययम् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
कृत्स्नामटित्वा पृथिवीं वाह्लीकेषु विपर्ययः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
कृत्स्ने नूनं सदसती इति लोको व्यवस्यति |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
कृत्स्नेय़ं पृथिवी देवी जरासन्धेन धीमता |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
कृतय़त्नतरस्त्वेष धार्तराष्ट्रो वृकोदरात् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
कृतय़त्ना रणे राजन्सम्पूज्य विधिवत्तदा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
कृतय़त्नाफलाश्चैव दृश्यन्ते शतशो नराः ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमासे गवामिव |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
कृप एव च दुर्धर्षो यदि जीवति पार्थिव |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
कृपं च भोजं च महाभुजावुभौ; तथैव गान्धारनृपं सहानुजम् |
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कृपं च सोमदत्तं च भीष्मं द्रोणं जनार्दनम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
कृपं च सोमदत्तं च समीय़ाय़ जनार्दनः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
कृपं तु दृष्ट्वा विरथं रथस्थो; नैच्छच्छरैस्ताडय़ितुं शिखण्डी |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृपं द्रोणं च शल्यं च सैन्धवं च महारथम् |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
कृपं निवर्तय़ामास युय़ुत्सुं च महारथम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
कृपं विव्याध सप्तत्या लक्ष्म चास्याहरत्त्रिभिः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृपं विव्याध सुभृशं कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
कृपं शल्यं विकर्णं च विद्ध्वा वहुभिराय़सैः |
१२० क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परन्तपः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
कृपः शल्यः सौमदत्तिर्विकर्णो; विविंशतिः कर्णदुर्योधनौ च |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १३०
दुर्योधन उवाच
कृपः शारद्वतश्चैव यत एते त्रय़स्ततः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कृपः शारद्वतस्तात हते कर्णे किमव्रवीत् ||
९७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
कृपः शारद्वतो धीमान्पार्श्वं रक्षतु दक्षिणम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
कृपः शारद्वतो यत्तः प्रत्युद्गच्छत्सुवेगितः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
कृपः शारद्वतो राजन्मागधश्च तरस्विनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
कृपः शारद्वतो राजन्रथय़ूथपय़ूथपः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
कृपः शिखण्डी च रणे समेतौ; दुर्योधनं सात्यकिरभ्यगच्छत |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
कृपकर्णादय़ो वीरा ऋषभाणामिवर्षभाः ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
कृपणं याचमानानां तद्राज्ञो वैशसं महत् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कृपणं वर्तय़िष्याम पातय़ित्वा नृपान्वहून् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृपणं वर्तय़िष्यामि कृपणैः सह जीविकाम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कृपणं वर्तय़िष्यामि शोच्यः सर्वस्य मन्दधीः ||
३६ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृपणं विलपन्नार्तो जरय़ाभिपरिप्लुतः |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
कृपणं वृष्णिशार्दूल दुःखशोकार्दिता भृशम् ||
४२ ख