द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
वेगेनापततः शूरान्प्रगृहीतशरासनान् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
वेगेनापततस्तांस्तु प्रभिन्नानिव वारणान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
वेगेनाभ्यद्रवत्सेनां किरञ्शरशतैः शितैः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
वेगेनाभ्यद्रवद्राजन्भीमसेनः प्रतापवान् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
वेगेनाभ्यपतत्क्रुद्धः सैन्धवस्य महद्वलम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
वेगेनाभ्यपतद्भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
वेगेनाभ्यहनद्भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
वेगेनेव शैलमभिहत्य जम्भः; शेते स कृष्णेन हतः परासुः ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचराः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति |
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
वेणीकृतशिरा राजन्नाम्ना चैव वृहन्नडा ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
वेणीविकृतकेशान्तः सोऽय़मद्य धनञ्जय़ः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वेणुवीणाधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
वेण्णा प्रवेणी भीमा च मेद्रथा चैव भारत ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
वेण्णा भीमरथी चोभे नद्यौ पापभय़ापहे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
वेण्णाय़ाः सङ्गमे स्नात्वा वाजपेय़फलं लभेत् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
वेतनं तस्य विहितं शालिवाहस्य भोजनम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
वेतनेन यथाय़ोग्यं प्रिय़वादेन चापरे ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
वेतसैर्वन्धनैश्चापि ये चान्ये वलवत्तराः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
वेतसो वेगमाय़ान्तं दृष्ट्वा नमति नेतरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षय़ात्मनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
युधिष्ठिर उवाच
वेत्ता त्वमस्य चार्थस्य वेद त्वां हि पितामहः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम; त्वय़ा ततं विश्वमनन्तरूप ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्ति धर्मभृतां श्रेष्ठस्ततो मे तद्गतं मनः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
वेत्ति यत्र न चैवाय़ं स्थितश्चलति तत्त्वतः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्तुं शक्यः सदा राजन्केवलं धर्मवुद्धिना ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
वेत्तुमर्हसि राजेन्द्र स्वाध्याय़गणितं महत् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
वेत्त्यादानविसर्गं यो निग्रहानुग्रहौ तथा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
वेत्थ चापि यथा जातो धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
वेत्थ तानभिनिर्वृत्तान्षडेते यस्य राशय़ः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्थ दाशार्ह सत्त्वं मे दीर्घकालं सहोषितः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
व्यास उवाच
वेत्थ धर्मं सत्यवति परं चापरमेव च |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्थ धर्मांश्च धर्मज्ञ समासेनेतरेण च |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वेत्रकीय़गृहे राजन्व्राह्मणच्छद्मरूपिणा |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
वेत्रकीय़गृहे राजा नाय़ं नय़मिहास्थितः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
वेत्रजर्झरहस्ताश्च द्वाराध्यक्षा विशां पते |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
द्रौपद्यु उवाच
वेत्स्यन्ति चैव भद्राणि राजन्पुण्येन कर्मणा ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्स्यामि त्वां विदेशेऽपि कवचेनोपसूचितम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
वेत्स्यामि वाणीमिति सम्प्रवृत्तां; सरस्वतीं श्वेतकेतुर्वभाषे ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
वेत्स्यामीषीकय़ा वीटां तामिषीकामथान्यया |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
वेद कृष्णस्य माहात्म्यं वेदास्य दृढभक्तिताम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वेद चास्त्रं भरद्वाजाद्दुर्धर्षः सत्यसङ्गरः |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वेद चास्त्रं व्रह्मशिरस्तस्माद्रक्ष्यो वृकोदरः ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्चेदिपते भृशम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
वेद धर्मविधिं कृत्स्नं भूतानां चाप्यनित्यताम् |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
वेद पुण्यं च कार्त्स्न्येन सम्यग्भरतसत्तम ||
१२ ख