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सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
कृपश्च सोमदत्तश्च वाह्लीकश्च महारथः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
कृपश्चाचार्यमुख्योऽय़ं महर्षेर्गौतमादपि |
४८ क
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्चिच्छेद पार्थस्य शतशोऽथ सहस्रशः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृपस्तु शरवर्षं तद्विनिहत्य महास्त्रवित् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य च महाराज हार्दिक्यस्य च दुर्मतेः ||
१०२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्च मे |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य निशिताग्रेण तांश्च तीक्ष्णमुखैः शरैः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
कृपस्य पार्थः सशरं शरासनं; हय़ान्ध्वजं सारथिमेव पत्रिभिः ||
६२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य वशमापन्नो मृत्योरास्यमिवातुरः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य सशरं चापं मध्ये चिच्छेद भारत |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
कृपस्य सोमदत्तस्य वाह्लीकस्य च धीमतः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृपस्य सोमदत्तस्य वाह्लीकस्य च धीमतः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
कृपस्य सोमदत्तस्य वाह्लीकस्य च पाण्डवः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
कृपस्यापि तथात्युग्रं धनुश्चिच्छेद पाण्डवः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
जनमेजय़ उवाच
कृपस्यापि महाव्रह्मन्सम्भवं वक्तुमर्हसि |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
कृपस्यैतद्रथानीकं प्रापय़स्वैतदेव माम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
कृपहार्दिक्ययोश्छित्त्वा चापे तावप्यथार्दय़त् ||
५१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्ट्वा तृट्समाहतम् ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
कृपां कुरु महावाहो मय़ि धर्मभृतां वर |
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कृपाच्च गौतमाद्राजन्पार्थिवाच्च तवात्मजात् ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
कृपाच्छारद्वताद्वीरः सर्वास्त्राण्युपलप्स्यते ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
कृपादीन्स तदा वीरान्सर्वानेव नराधिपः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
कृपादय़श्च ते सर्वे चत्वारः पाण्डवाश्च ह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
कृपानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं च भारत |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृपालुर्नित्यशो वीरस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
कृपालुषु परिक्लेशान्पाण्डवानां प्रकीर्तय़न् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कृपाविष्टः कृपो राजन्वय़ःशीलसमन्वितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १०
सुरभिरु उवाच
कृपाविष्टास्मि देवेन्द्र मनश्चोद्विजते मम ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
कृपाय़ च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
कृपाय़माणस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
कृपी कृपणमन्वास्ते दुःखोपहतचेतना ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
कृपे चैव महेष्वासे द्रवतीय़ं वरूथिनी ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कृपे संनिहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृपेण छादितं दृष्ट्वा नृपोत्तम शिखण्डिनम् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
कृपेण तेन ते तात कथमासीत्समागमः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
कृपेण शरवर्षाणि विप्रमुक्तानि संय़ुगे |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
कृपेण शल्येन शलेन चैव; तथा विभो चित्रसेनेन चाजौ |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
कृपेण सहितं यान्तं युक्तं च कृतवर्मणा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
कृपो दुर्योधनः कर्णः कृतवर्माथ सौवलः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
कृपो भूरिश्रवाः शल्यश्चित्रसेनो विविंशतिः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
कृपो भूरिश्रवाः शल्यो द्रोणपुत्रो विविंशतिः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
कृपो युय़ुत्सुः सूतश्च सञ्जय़श्चापरं रथम् ||
७० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
कृपो वा कृतवर्मा च द्रौणिर्दुःशासनोऽपि वा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
कृपो शारद्वतो राजन्वारय़ामास संय़ुगे ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
कृपोऽथ भोजश्च तवात्मजस्तथा; स्वय़ं च कर्णो निशितैरताडय़त् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
कृपय़ा च पुनस्तेन जीवेति स विसर्जितः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
कृपय़ा परय़ाविष्टः पुत्रस्नेहाच्च भारत ||
८ ख