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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
कृपय़ा परय़ाविष्टो वनमेव जगाम ह ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
कृपय़ा परय़ाविष्टो विषीदन्निदमव्रवीत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
कृपय़ा यन्मय़ा वालाविमौ संवर्धिताविति |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कृपय़ा विरथं कृत्वा नाहनद्धर्मवित्तय़ा ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कृपय़ाभिपरीतस्य घोरं युद्धमवर्तत ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
कृमिकं प्राहसत्तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः ||
३२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं स जीवति |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृमिभावात्प्रमुक्तस्तु ततो जाय़ति गर्दभः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत |
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृमिर्भवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत |
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जाय़ति मानुषः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
कृमिर्हि कोशकारस्तु वध्यते स्वपरिग्रहात् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
कृशं च भरते या गौर्मम पुत्रमपस्तनम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
कृशः परिमिताहारश्चर्मचीरजटाधरः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी क्वचित् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
कृशत्वे न समं राजन्नाशाय़ा विद्यते नृप |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
कृशप्राणाः कृशधनास्तेषु दत्तं महाफलम् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ||
११० ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गा; न्दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
राजो उवाच
कृशाकृशे मय़ा व्रह्मन्गृहीते वचनात्तव |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
कृशाङ्गाः सुव्रताश्चैव तपसा दग्धकिल्विषाः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
कृशानर्थांस्तथा केचिदकृशांस्तत्र कुर्वते |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
कृशानुं ये जुह्वति श्रद्दधानाः; सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
कृशानुवर्णः किञ्चिच्च किञ्चिद्धिष्ण्याकृतिः प्रभुः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
कृशाशाः सुव्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्विषाः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृशाश्चासन्प्रजाः सर्वाः क्षीय़माणे निशाकरे ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
कृशाश्वतनय़ा ह्यद्य मत्प्रय़ुक्ता महामृधे |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
कृशाश्वो यौवनाश्वश्च चित्राश्वः सत्यवांस्तथा |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
कृशाय़ म्रिय़माणाय़ वृत्तिम्लानाय़ सीदते |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
कृशाय़ ह्रीमते तात वृत्तिक्षीणाय़ सीदते |
११ क
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
कृशो वा दुर्वलो वापि दीनो भीतोऽपि वा नरः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
कृषन्ति वहवो भारान्वध्नन्ति दमय़न्ति च ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णाय़सो महान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
कृषिं साध्विति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारुणा |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
कृषिगोरक्षमास्थाय़ व्यसने वृत्तिसङ्क्षय़े ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
कृषिगोरक्षवाणिज्यमुपजीवन्त्यमाय़या |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
कृषिगोरक्ष्यमप्यन्ये भैक्षमन्येऽप्यनुष्ठिताः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यच्चान्यत्किञ्चिदीदृशम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यो विशत्यनिशं शुचिः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं लोकानामिह जीवनम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमिह लोकस्य जीवनम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
कृषिभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वञ्श्राद्धं पुनर्वसौ |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
कृषिभागी वहुधनो वहुपुत्रश्च जाय़ते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
कृषिर्भूवाचकः शव्दो णश्च निर्वृतिवाचकः |
५ क