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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
कृषिवाणिज्यगोरक्ष्यं शिल्पानि विविधानि च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
कृषिश्च पाशुपाल्यं च वाणिज्यं च विशामपि |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
कृषिश्च पाशुपाल्यं च विशां दानं च सर्वशः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कृष्टपच्यैव पृथिवी भवत्यल्पफला तथा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कृष्टपच्यैव पृथिवी भवन्त्योषधय़स्तथा ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
कृष्टे क्षेत्रे तथावर्षन्किं नु साधय़ते फलम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
कृष्ण इत्येव दशमं नाम चक्रे पिता मम |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
कृष्ण एव हि यष्टव्यो यज्ञैश्चैष सनातनः ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्ण एव हि लोकानां भावनो मोहनस्तथा |
८२ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय १६
युधिष्ठिर उवाच
कृष्ण कोऽय़ं जरासन्धः किंवीर्यः किम्पराक्रमः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
कृष्ण त्वमात्मनास्राक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
कृष्ण दिष्ट्या मम प्रीतिर्महती प्रतिपादिता |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
कृष्ण पश्य महेष्वासं भीष्मं भीमपराक्रमम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
कृष्ण पाय़समिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वरः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
कृष्ण भीष्मः सुसंरव्धः सहितः सर्वपार्थिवैः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
कृष्णं च जिष्णुं च हरिं नरं च; त्राणाय़ विक्रोश नय़ामि हि त्वाम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
कृष्णं च पुण्डरीकाक्षं किल्विषी भ्रूणहा यथा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा युद्धान्मेने जितं जय़म् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा सम्प्राप परमां मुदम् ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णं चापि महावाहुं पर्यपृच्छत धर्मराट् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णं निकृन्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कृष्णं लोकान्दर्शय़ानं शरीरे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णः पराय़णं चैषां ज्योतिषामिव चन्द्रमाः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
कृष्णः पृथ्वीमसृजत्खं दिवं च; वराहोऽय़ं भीमवलः पुराणः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णः श्वेतान्महावेगानश्वान्कनकभूषणान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
कृष्णः सङ्कल्पितो धात्रा तन्न मिथ्या भवेदिति ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनञ्जय़सहाय़वान् ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
कृष्णग्रीवान्महाकाय़ान्रासभाञ्शतपातिनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
कृष्णग्रीवाश्च शकुना लम्वमाना भय़ानकाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वितीय़ो विक्रम्य तुष्ट्यर्थं जातवेदसः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं काली चिन्तय़ामास वै मुनिम् ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं चैव नारदं च महामुनिम् ||
२० ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं राजन्ददर्शासीनमाश्रमे ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं व्यासं पुत्रो वैय़ासकिः शुकः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं व्यासं विद्धि नाराय़णं प्रभुम् |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं व्यासमासीनमृषिभिः सह ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
कृष्णद्वैपाय़नः साक्षाद्भगवान्मामजीजनत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
कृष्णद्वैपाय़नप्रोक्तं नैमिषारण्यवासिनः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कृष्णद्वैपाय़नप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
कृष्णद्वैपाय़नमतं महाभारतमादितः ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नश्चैव क्षत्ता च विदुरस्तथा ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नश्चैव धौम्यश्च जपतां वरः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाच्चैव केशवाच्च न संशय़ः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाच्चैव तथा कुरुपितामहात् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाच्चैव नारदाद्विदुरात्तथा ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा |
८२ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |
९५ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नात्तात गृहीतोपनिषन्मय़ा |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाद्भीरु कुरूणां वंशवृद्धय़े ||
२३ ख