कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
दहञ्शत्रून्नरव्याघ्र शुशुभे स परन्तपः ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसंमतौ |
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
दहते मामकान्सर्वान्कृष्णवर्त्मेव काननम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
दहत्क्वचिज्ज्वलन इवावलेलिह; त्प्रसह्य तानसुरगणान्न्यकृन्तत |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दहत्यग्निरिवानिष्टान्यमय़न्भवते यमः ||
१०१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
दहत्याशीविषः क्रुद्धो यावत्पश्यति चक्षुषा |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिः स्थितिश्च यत् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
दहत्येष च वः सैन्यं द्रोणः प्रहरतां वरः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
दहने यत्सपुत्राय़ा निशि मातुस्तवानघ |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
दहने हि कृतो यत्नस्त्वय़ास्मासु विशेषतः |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशां पते |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
दहन्तं पाण्डवानीकं वनमग्निमिवोद्धतम् ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
दहन्तं समरे सैन्यं तव कक्षं यथोल्वणम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
दहन्तमिव तीक्ष्णांशुं घोरं वाय़ुसमीरितम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हाय़नाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हाय़नाः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
दहन्तौ लोचनै राजन्परस्परवधैषिणौ ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
दहन्दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षगः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
दहन्निव तदा चेतः क्रोधः समभवन्महान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
दहन्मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतोऽभवत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
दहन्वनमिवैकान्ते प्रतीच्यां प्रत्यदृश्यत ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२४
विनतो उवाच
दहेदङ्गारवत्पुत्र तं विद्याद्वाह्मणर्षभम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
दहेदेष च मामेव निगृहीतः स्वतेजसा ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
दहेय़ं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मय़ा ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
दहेय़ं त्वां चक्षुषा दारुणेन; सङ्क्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
४१
अर्जुन उवाच
दहेय़ं येन सङ्ग्रामे दानवान्राक्षसांस्तथा |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यतस्तस्य विवभौ रूपं दावस्य भारत |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यतागुरुणा चैव देशे देशे सुगन्धिना |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यतामिव वेणूनामासीत्परपुरञ्जय़ ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यते स्म दिवारात्रं न च शर्माधिगच्छति ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
दह्यतेऽदः शरीरं मे संस्यूतोऽस्मि महेषुभिः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यतो मोचय़ामास तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
दह्यत्सु मृगय़ूथेषु द्विजिह्वेषु समन्ततः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यन्तां कीचकाः शीघ्रं रत्नैर्गन्धैश्च सर्वशः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
दह्यन्तेऽङ्गानि मे भद्रे दिशो न प्रतिभान्ति च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
दह्यमानः पापकृत्या जगाम जनमेजय़ः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
दह्यमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रिय़स्ताः सम्प्रदुद्रुवुः ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
दह्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथा |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
दह्यमाना इव तदा पस्पृशुश्चरणैर्महीम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
दह्यमाना दिवारात्रं वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
दह्यमाना भृशं वाला वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमाना मनोदुःखैर्व्याधिभिश्चातुरा नराः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
दह्यमाना महानागाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दह्यमाना यथा राजञ्शलभा इव पावकम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वह्निना |
२३ क