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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
कृष्यादिष्वभवन्सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
कृष्यादीनि हि कर्माणि सस्यसंहरणानि च |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
कृसरेण समांसेन निवापैस्तिलसंय़ुतैः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
के कर्णं वाजहुः शूराः के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
के गुणास्तत्र वसतां किं तपः कश्च निश्चय़ः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
के च तं वरदं वीरमन्वय़ुर्द्विजसत्तमम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
के च तत्र तनुं त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
के च तत्र सभास्तारा राजानो व्रह्मवित्तम |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
के च प्रपक्षौ पक्षौ वा मम सैन्यस्य सञ्जय़ |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
के च प्रवीराः पार्थानां युधि कर्णमवारय़न् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
युधिष्ठिर उवाच
के चर्षय़ो महाभागा दिक्षु प्रत्येकशः स्मृताः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
के चास्य पृष्ठतोऽगच्छन्वीराः शूरस्य युध्यतः |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिन्दमम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधय़न् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
के चैनानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
धृतराष्ट्र उवाच
के चोत्तरमरक्षन्त निघ्नतः शात्रवान्रणे ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
के तं यान्तमनुप्रेय़ुः के चास्यासन्पुरोगमाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
के तत्र नाजहुर्द्रोणं के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
के तत्रान्ये कितवा दीव्यमाना; विना राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सूत उवाच
के त्वां युधि पराक्रान्तं कालान्तकय़मोपमम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
के दुष्प्रधर्षं राजानमिष्वासवरमच्युतम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
के देशाः के जनपदा आश्रमाः के च पर्वताः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
शिलवृत्तिरु उवाच
के देशाः के जनपदाः केऽऽश्रमाः के च पर्वताः |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
के देशाः परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि ते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
शिष्य उवाच
के दोषा मनसा त्यक्ताः के वुद्ध्या शिथिलीकृताः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
के धर्माः सर्ववर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
के न हिंसन्ति जीवन्वै लोकेऽस्मिन्द्विजसत्तम |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथाः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
के नु तत्र रणे वीराः प्रत्युदीय़ुर्धनञ्जय़म् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
के नो मार्गाः शिवाश्च स्युः किं सत्यं किं च दुष्कृतम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
शिष्य उवाच
के पन्थानः शिवाः सन्ति किं सुखं किं च दुष्कृतम् ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
शिष्य उवाच
के पुनः पुनराय़ान्ति के मोहादफला इव ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नतः शात्रवान्रणे ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भीष्ममन्तिके |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
के पुरस्तादय़ुध्यन्त निघ्नतः शात्रवान्रणे ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
के पूज्याः के नमस्कार्या मानवैर्भरतर्षभ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
के पूज्याः के नमस्कार्याः कथं वर्तेत केषु च |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
युधिष्ठिर उवाच
के पूज्याः के नमस्कार्याः कान्नमस्यसि भारत |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
धृतराष्ट्र उवाच
के पूर्वं प्राहरंस्तत्र कुरवः पाण्डवास्तथा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
के पूर्वं प्राहरंस्तत्र युद्धे हृदय़कम्पने |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
युधिष्ठिर उवाच
के पूर्वमासन्पतय़ः प्रजानां भरतर्षभ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
के पृष्ठतोऽस्य ह्यभवन्वीरा वीरस्य युध्यतः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
के भवन्तोऽवलम्वन्ते गर्तेऽस्मिन्वा अधोमुखाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
सूत उवाच
के भवन्तोऽवलम्वन्ते वीरणस्तम्वमाश्रिताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
के मानुरक्ता राजानः के भय़ात्समुपाश्रिताः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
के यूय़मिह सम्प्राप्ता भक्ष्यभूता ममान्तिकम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
युधिष्ठिर उवाच
के लोका युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
के वा तत्र तनूस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
के वा भुवि चिकित्सन्ते रोगार्तान्मृगपक्षिणः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
के वीराः पर्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५८ ख