वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्द्विजः कश्चिदर्जुनस्य प्रिय़ः सखा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्धर्मराजं तु कृष्णो; दशार्हय़ोधाः कुकुरान्धकाश्च |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्धर्षकरं वचस्तदा; रथर्षभान्सर्वमहारथर्षभः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्धृष्टमना वासुदेवं धनञ्जय़ः |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्भीमसेनं सात्यकिः सत्यविक्रमः |
१११ क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं; किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
अथाव्रवीद्यक्षपतिस्तान्यक्षाननुगांस्तदा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
अथाव्रवीद्यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रिय़ाम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रिय़ाम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्वको दाल्भ्यो धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्वासुदेवं कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्वासुदेवः पार्थं किं क्रीडसेऽनघ |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्वासुदेवो रथस्थो; राधेय़ दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्वासुदेवोऽपि पार्थं; दृष्ट्वा रथेषून्प्रतिहन्यमानान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
अथाव्रवीद्वाहुकस्तं सङ्ख्याय़ेमं विभीतकम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
अथाव्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽय़ं वध्यतामिति ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
अथाव्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावय़ोरिह |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
अथाव्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं; समाभाष्य तमृषिं जातरोषम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महातेजा वाक्यं कौरवनन्दनः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् |
७४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीन्महाप्राज्ञो भारद्वाजः प्रतापवान् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
अथाव्रवीन्महाप्राज्ञो विदुरः सर्वधर्मवित् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीन्महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीन्महाराज वासुदेवो महाय़शाः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महाराजो गान्धारीं धर्मदर्शिनीम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महावाहुर्भीमसेनो महावलः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्महावीर्यो द्रोणस्तत्त्वार्थदर्शिवान् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अथाव्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरन्दरः ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अथाव्रवीन्महासेनं महादेवो वृहद्वचः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीन्मय़ः पार्थमर्जुनं जय़तां वरम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
अथाव्रवील्लोकगुरुर्व्रह्मा लोकपितामहः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अथाशोकः समादाय़ रथं हेमपरिष्कृतम् |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय़ वारुणिः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अथाश्रमपदं प्राप्य तं स्म भूय़ो महात्मनः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अथाश्रु पतितं तेषां दीनानामवसीदताम् |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
अथाश्वस्तः स विसमृणालमश्वस्याग्रे निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे समाविशत् ||
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अथाश्वाद्धम्यमानात्सर्वस्रोतोभ्यः सधूमा अर्चिषोऽग्नेर्निष्पेतुः ||
१५७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
अथाश्विनौ प्रहस्यैतामव्रूतां पुनरेव तु |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ; न्मातामहं कौतुकादिन्द्रकल्पम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
अथाष्टकः पुरं प्राय़ात्तदा सोमपुरप्रभम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
अथासनमुपादाय़ च्यवनस्य महामुनेः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अथासनान्याविशतां पुरस्ता; दुभौ विराटद्रुपदौ नरेन्द्रौ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
अथासीनेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
अथासुरं मय़ं नाम तक्षकस्य निवेशनात् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
अथासुरा गिरिभिरदीनचेतसो; मुहुर्मुहुः सुरगणमर्दय़ंस्तदा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
अथासृङ्मेऽस्रवद्घोरं गिरेर्गैरिकधातुवत् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अथासौ पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदा नृप ||
१६ ख